विशेषसम्पादकीय

असर विशेष: भृतहरि के ज्ञान सूत्र (8) धन का सदुपयोग

रिटायर्ड मेजर जनरल एके शौरी की कलम से..

 रिटायर्ड मेजर जनरल एके शौरी….

भर्तृहरि धन के मूल्य और महत्व को समझाते हुए इसके उपयोग के बारे में बात करते हैं। उनका कहना है कि धन की गति तीन प्रकार की होती है। पहला, उस व्यक्ति को देना जिसे इसकी आवश्यकता हो, सक्षम भी हो और पात्र भी हो। इससे व्यक्ति को सहारा मिलेगा, उसे जीवन में आगे बढ़ने में मदद मिलेगी और आर्थिक सहयोग से उसकी अन्य जरूरतें भी पूरी होंगी। धन की दूसरी गति है उसे सोच-समझकर खर्च करना। इसका मतलब यह है कि इसे इस तरह से खर्च किया जाए ताकि इसके परिणाम अधिक से अधिक हो। क्योंकि पैसा जीवन में कुछ बड़ा हासिल करने का एक साधन मात्र है; इसलिए इसे विवेक पूर्ण, बुद्धिमानी और मितव्ययिता पूर्वक खर्च करना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। धन की तीसरी गति तब होती है जब इसका उपयोग चोरी- यारी में विनाश के तौर पर किया जाता है। शराब पीने, जुआ खेलने और नाचने-गाने में यदि इसका प्रयोग किया जाए तो यह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और यह धन की तीसरी गति है। अब जो व्यक्ति न तो अपने धन से किसी की जरूरतों को पूरा करता है और न ही सहायता देता है और न ही अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों पर खर्च करता है तो उसके जीवन में धन की तीसरी गति प्रवेश कर जाती है और धन भी कम होने लगता है।

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इसी नीतिशास्त्र में भर्तृहरि राजाओं को भी सलाह देते हुए कहते हैं कि उन्हें अपनी प्रजा के साथ गाय की तरह व्यवहार करना चाहिए। उनका कहना है कि एक राजा को धरती माता के साथ एक गाय की तरह व्यवहार करना चाहिए और फिर अपनी प्रजा के साथ बछड़े की तरह व्यवहार करना चाहिए। असल में इस बात का मतलब यह है कि जो कुछ भी उसे मिले उसे आगे बांट दिया जाए। यदि राजा इसी प्रकार आचरण करेगा तो गाय के समान धरती माता भी उसे अच्छे फल देगी। भर्तृहरि आगे कहते हैं कि विधाता ने हमारे माथे पर जितनी भी संपत्ति लिख दी है, परिस्थिति कोई भी हो, हर किसी को मिलती है ; चाहे कोई रेगिस्तान में भटक रहा हो अथवा पहाड़ियों की चोटी पर। इसलिए जीवन में धैर्य रखना चाहिए। धनवान लोगों के पास जाकर धन मांगकर भिखारियों जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। वह एक ऐसे घड़े का उदाहरण देते हैं जिसकी पानी की आवश्यकता ठीक से पूरी हो जाती है चाहे वो वह समुद्र के पास जाता है या कुएं के पास। भर्तृहरि एक राजा के छह आवश्यक गुणों के बारे में बात करते हैं और उनमें से दो धन से संबंधित हैं।

वह कहते हैं कि एक राजा को अपना धन निश्चित रूप से जरूरतमंद लोगों और अपनी प्रजा के बीच वितरित करना चाहिए। लेकिन वह राजा को यह भी चेतावनी देते हुए कहते हैं कि उन्हें उन विद्वानों और आश्रितों के बीच संपत्ति का वितरण नहीं करना चाहिए जिनके पास इसे पाने की न तो इच्छा है और न ही क्षमता है या जो अपने दोस्तों की सहायता करने और मदद करने में झिझक महसूस करते हैं।

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