सम्पादकीय

असर संपादकीय; भारत में सामाजिक नागरिक संस्थाएं – एक ऐतिहासिक सन्दर्भ

सचिन कुमार जैन की कलम से..

भारत में सामाजिक नागरिक संस्थाओं की एक वृहद् पृष्ठभूमि है. समाज और बाज़ार के अतिरिक्त सामाजिक नागरिक क्षेत्र ही सबसे ज्यादा प्रभावी इकाई है, जिसके उद्देश्य समाज पर गहरा प्रभाव डालते हैं. चूंकि उक्त संस्थाएं समाज की समस्याओं का विश्लेषण करते समय राजनीति आर्थिक नजरिया रखती हैं और समस्या के मूल में जाकर कारणों को समझती हैं, इसलिए राज्य व्यवस्था और बाज़ार व्यवस्था के लिए वे असहज स्थितियां खड़ी करती हैं. ये संस्थाएं मूलतः समाज-जनपक्षीय नज़रिए से बदलाव की रूपरेखा तय करती हैं, क्रियान्वयन और जनवकालत करती हैं. यही कारण है कि राज्य और बाज़ार सामाजिक नागरिक संस्थाओं को या तो अपने चरित्र में समाहित कर लेना चाहते हैं, या फिर उनके प्रभाव और वजूद को ख़तम कर देना चाहते हैं. सामाजिक नागरिक समूह देशज कानूनों और नियमों के प्रति भी जवाबदेय होते हैं और समाज के प्रति भी. अतः व्यापक समाज को यह समझना होगा कि उक्त संस्थाओं के गैर-जवाबदेय होने की कोई संभावना ही नहीं है.
यह ध्यान रखना जरूरी होगा कि केवल राज्य और बाज़ार/निजी क्षेत्र के बीच व्यवस्था का बंटवारा न हो जाए. समाज का अपना स्थान होता है. उस स्थान को सुरक्षित रखने के लिए उक्त संस्थाओं की अहम् भूमिका होती है. इसे हम नागरिक स्थान (सिविक स्पेस) कह सकते हैं. हम किसी आदर्श कल्पना में नहीं खो जाना चाहते हैं. हमें यह अहसास होना चाहिए कि सामाजिक व्यवस्था-राज्य व्यवस्था-बाज़ार व्यवस्था की अपनी- अपनी विसंगतियां हैं. ये एकदूसरे को अपने आधिपत्य में लेने का प्रयास करती रहती हैं. उक्त संस्थाओं की भूमिका होती है कि वह इन विसंगतियों को सामने खड़ी हों और रचनात्मक ढंग से उनका बदलाव के नज़रिए से रचनात्मक प्रतिकार करें, इनकी तार्किक समीक्षा करे और सकारात्मक बदलाव की पहल करे. इन मायनों में सामाजिक नागरिक संस्थाओं की मानव जीवन में बेहद अहम् भूमिका है.
उक्त संस्थाओं को नियंत्रित करने की कोशिश किसी एक राज्यकाल में नहीं होती है, समय-समय पर ऐसी कोशिशें होती रहती हैं. इस प्रक्रिया में आक्षेप लगाने और कानूनों के जरिये आवाज़ को कुंद करने की रणनीति अपनाई जाती है. इसी परिप्रेक्ष्य में यह उल्लेख करना जरूरी है कि उक्त संस्थाएं समाज-अर्थव्यवस्था और राजनीतिक पहलुओं का अध्ययन-विश्लेषण तो करती हैं, लेकिन अपनी स्थिति का आंकलन करना भूल जाती हैं. इसका प्रभाव यह पड़ता है कि अपनी विश्वसनीयता पर होने वाले आक्रमणों से वे खुद की सुरक्षा करने के लिए तैयार नहीं हो पाती हैं.
यह एक महत्वपूर्ण पहलू है कि समाज और समाज की आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था को किस नज़रिए से देखा-समझा जाता है? राज्य अपने नज़रिए को सर्वोपरि मानता है और बाज़ार उसे अपने नज़रिए से मापता-आंकता है. ऐसे में समाज और समाज के लोगों का पक्ष और बेहतर समाज के मूल्य कहीं खो जाते हैं. जब कि, सामाजिक नागरिक संस्थाएं मुख्य रूप से व्यवस्था और व्यवहार को मूल्यों के मानकों के दृष्टिकोण से देखती हैं.
वे यह मानकर ही संतोष कर लेती हैं कि संस्थाएं तो समाज के लिए काम करती हैं, अपनी छवि, अपनी अस्तित्व और अपने पक्ष को रखने की उन्हें जरूरत ही नहीं है. यह एक किस्म से कमज़ोर विचार है. समाज में, व्यवस्था में और व्यवस्था को प्रभावित करने वाले हर समूह/व्यक्ति के मन में उक्त संस्थाओं की एक व्यवस्थित छवि होना चाहिए और यह छवि किन्हीं धारणाओं और राजनीतिक आक्षेपों से न गढ़ी जाए, इसलिए सामाजिक नागरिक संस्थाओं को अपने आपको खोलना होगा और रणनीतिक संचार की नीति को अपनाना होगा.
यह देखकर बहुत निराशा हुई, कि सामाजिक नागरिक संस्थाओं के समूह में अपने वजूद को मज़बूत करने की कोई तत्परता नहीं दिखाई देती है. चूंकि मुद्दों-विषय और बाहरी संस्थाओं के बारे में बात करना-संघर्ष करना तुलनात्मक रूप से आसान काम होता है, इसलिए संस्थाएं वहां बहुत कड़ी मेहनत करती हैं. लेकिन सामाजिक नागरिक संस्थाओं का समूह यह समझ नहीं पा रहा है कि समाज में जिस तरह की भूमिका उससे निभाने की अपेक्षा की जाती है, उसे निभाने के लिए एक तरफ तो उसे अपनी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक पक्षधरता को स्पष्ट करते हुए अपने लक्ष्य और अपनी भूमिका को समझना होगा, तो वहीँ दूसरी तरफ जवाबदेहिता, संवेदनशीलता, पारदर्शिता, करुणा, अहिंसा, तार्किकता, समानता, बंधुता, स्वतंत्रता सरीखे मूल्यों से अपने अंतस को बहुत मज़बूत करना होगा. ये इन दोनों ही पहलुओं पर संस्थाओं के समुदाय की तैयारी बहुत कमज़ोर नज़र आती है.
ऐतिहासिक सन्दर्भ
मानव विकास की प्राचीन व्यवस्था में निजी संपत्ति की अवधारणा नहीं थी. यही कारण है कि प्रकृति से प्राप्त होने वाले संसाधनों का उपयोग सभी समानता से करते रहे. हालांकि इस बीच आपसी संघर्ष भी चलते रहे. जब राज्य और बाज़ार की व्यवस्था का जन्म हुआ, तब संपत्ति के मालिकाना हक़ की व्यवस्था बनने लगी. युद्ध होने लगे और युद्ध में जीती हुई संपत्ति पर ‘नियंत्रण’” की व्यवस्था भी बनने लगी. जब धर्म की अवधारणा का उदय हुआ, तब अच्छे और बुरे कर्मों का वर्गीकरण हुआ. राजा, धनिक वर्ग, जमींदार और व्यापारी से अपेक्षा की जाने लगी कि वे पवित्र कार्य करेंगे. वंचितों और गरीबों को सहायता प्रदान करेंगे. ऐतिहासिक सन्दर्भों में सामाजिक नागरिक पहल वह कार्य होता है जो सामूहिक और व्यक्तिगत रूप से किसी व्यवस्था के निर्माण या बदलाव की खातिर तथा किसी व्यक्ति, परिवार या समुदाय की सहायता के उद्देश्य से किया गया हो.
भारत में वैदिक काल से ही दया, दान, करुणा, कल्याण, अहिंसा, किसी को दुःख न देना और परस्पर सहयोग करने के सिद्धांत मौजूद रहे हैं. महाभारत के कथानक में “कर्ण” नामक पात्र के साथ “दानवीर” जुड़ा ही रहा.
समाज में भी कुएं और बावड़ियां खुदवाना, धर्मशालाएं और मुसाफिरखाने संचालित करना जरूरी सामाजिक दायित्व माने गये. इसी तरह पशुओं और पर्यावरण की रक्षा करने का काम भी समाज की अहम् जिम्मेदारी में शामिल रहा.
भारत में सामाजिक कार्य की अवधारणा को राज्य की भूमिका और धर्म की अवधारणा के साथ जोड़ दिया गया. मसलन राजा ऐसे काम करेंगे, जिनसे सबका कल्याण हो, कोई भी गरीब या भूखा न रहे. किसी के साथ अन्याय न हो. जैसे सम्राट अशोक ने घोषणा की थी कि जरूरत पड़ने पर कोई भी, कभी भी सम्राट के पास आ सकता है.
भारत आये मुसलमानों ने भी दान और कल्याण की अवधारणा को आगे बढ़ाया. इस्लाम में “जकात” की अवधारणा के अंतर्गत यह नियम था कि हर व्यक्ति अपनी आय का एक निर्धारित भाग गरीबों, वंचितों और समाज की भलाई के लिए खर्च करेगा. इस्लाम में “खैरात यानी दान” की भी अवधारणा रही है.
यह एक स्थापित तथ्य है कि राज्य और बाज़ार हमेशा समाज के सभी पहलुओं को जान-समझ नहीं सकते हैं, न ही विविध पहलुओं के मुताबिक़ अपनी भूमिका का निर्वहन कर पाते हैं. तब अनछुए पहलुओं को छूने के लिए सामाजिक नागरिक संस्थाओं या सामाजिक नागरिक पहल की नीव पड़ती है.
राज्य किसी भी रूप का रहे, वह समाज के वंचित तबकों के प्रति किसी मुकाम पर आकर उदासीन हो ही जाता है. जब कोई राज्य व्यवस्था समाज के प्रभुत्वसंपन्न व्यक्तियों/परिवारों/समुदाय को लाभान्वित करने के लिए जनकल्याणकारी राज्य की भूमिका से विचलित होती है, तब सामाजिक नागरिक संस्थाएं पहल करती हैं और राज्य की जवाबदेहिता को जागृत करती हैं.
इसके दूसरी तरफ बाज़ार हमेशा से “श्रम” का शोषण करता रहा है. इससे बाज़ार को दो तरह के लाभ होते हैं – उसका मुनाफा बढ़ता है और वंचित तबकों पर उनका दबाव और नियंत्रण बना रहता है. ज्यादातर स्थितियों में राज्य और बाज़ार एक दूसरे को मज़बूत करने में सहायता करते हैं.
उन्नीसवीं शताब्दी का सन्दर्भ
वर्ष 1800 में ईसाई मिशनरी विलियन कैरी, जोशुआ मार्शमैन और विलियन वार्ड ने कलकत्ता के उत्तर में सीरामपुर मिशन प्रेस की स्थापना की. इसका उद्देश्य बंगाल में जन शिक्षण को बढ़ावा देना और सामान्य लोगों को विभिन्न किताबें स्थानीय भाषा में कम कीमत पर उपलब्ध करवाना था. सीरामपुर मिशन प्रेस ने विभिन्न धार्मिक किताबों का बंगाली भाषा में अनुवाद करना शुरू किया. बाइबिल का अनुवाद स्वयं विलियन कैरी के निर्देशन में हुआ, जबकि रामायण और महाभारत का अनुवाद रामराम बसु और मृत्युंजय विद्यालंकार के निर्देशन में हुआ.
इस प्रेस ने प्राचीन भारतीय साहित्य का बंगाली भाषा में अनुवाद करवाया. इसके साथ ही इन्होनें बंगाली गद्य को विकसित करने में भी बड़ी भूमिका निभाई. सीरामपुर मिशन प्रेस ने बच्चों के स्कूल के पाठ्यक्रम की किताबें भी प्रकाशित कीं. वर्ष 1817 में कलकत्ता स्कूल बुक सोसायटी की स्थापना हुई ताकि बच्चों को आसानी से पुस्तकें उपलब्ध करवाई जा सकें. यह सीरामपुर मिशन प्रेस की ही पहल थी, जिसके कारण बंगाल में साहित्य, आध्यात्म और पाठ्यक्रम की किताबों का अनुवाद संभव हुआ और पूरे बंगाल में जनशिक्षा का प्रसार हुआ.
उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में सर सैय्यद अहम्द खान और शरियतुल्लाह ने मुस्लिम समाज में सुधारों, मसलन मुस्लिम समाज में जाति व्यवस्था की समाप्ति, की जरूरत को महसूस किया. वर्ष 1863 में नवाब अब्दुल लतीफ़ ने मोहम्मडन लिटरेसी सोसायटी ऑफ बंगाल की स्थापना की ताकि मुस्लिम समाज में शिक्षा का प्रसार किया जा सके. इसी समय पर्दा प्रथा और बहुविवाह सरीखी सामाजिक कुरीतियों को मिटाने की भी बात हो रही थी. वर्ष 1889 में मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने भारतीय मुसलमानों में आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार करने के लिए अहमदिया आन्दोलन की आधारशिला रखी.
भारत के हिन्दू समाज में विसंगतियों को दूर करने के लिए कई रचनात्मक आन्दोलन चले. वर्ष 1828 में राजा राम मोहन राय ने ब्रह्म समाज की स्थापना की. उन्होंने सती प्रथा और बाल विवाह की कुरीतियों को समाप्त करने के लिए समाज सुधार की पहल भी की. सामाजिक बदलाव का लक्ष्य राजा राम मोहन राय के लिए कोई शौकिया और आसान काम नहीं था. उन्होंने अपनी भाभी को सती होते हुए देखा था. जब उन्होंने सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ पहल की तो उन्हें सबसे पहले अपने परिवार से ही, अपने पिता से ही टकराना पड़ा और अपना घर छोड़ना पड़ा.
इसके बाद वर्ष 1867 में डॉ. आत्माराम पांडुरंग ने प्रार्थना समाज की स्थापना की. उन्होंने अन्तर्जातीय विवाह, सब जातियों का सहभोज, विधवा विवाह और महिलाओं एवं वंचित जातियों के उत्थान के लिए पहल की. कुरीतियों से भरे माहौल में प्रार्थना समाज ने जो पहल की थी, वह इतना आसान काम नहीं था.
इस समुदाय के सदस्यों ने ईसाइयों द्वारा पकाई गई रोटी खाई और मुसलमानों द्वारा लाया गया पानी पिया।
महात्मा ज्योतिबा फुले ने 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की. उनका मकसद भी जाति व्यवस्था को समाप्त करना तथा वंचित जातियों और महिलाओं को शिक्षा का अधिकार दिलाना था. सावित्री बाई फुले ने वर्ष 1848 में भारत में महिलाओं के लिए पहला विद्यालय खोला था.
वह ऐसा समय था, जब विधवा महिलाओं का सामाजिक-आर्थिक-शारीरिक शोषण होता था. जब शोषण से वे गर्भवती हो जातीं, तो उनका परित्याग कर दिया जाता या भ्रूण ह्त्या करवा दी जाती. इसे देखते हुए सावित्री बाई फुले ने वर्ष 1853 में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए एक आश्रय घर खोला. जिसका नाम था – ‘बाल ह्त्या प्रतिबन्ध गृह’. वहां शोषण की शिकार महिलाओं के सुरक्षित प्रसव होते थे और अगर महिलायें सोचती थीं कि उनके शिशु सुरक्षित नहीं रहेंगे, तब इसी गृह में उनका लालन-पालन होता था.
कलकत्ता के हिन्दू कालेज के विचारकों और चिंतकों ने ‘युवा बंगाल आन्दोलन’ (यंग बंगाल मूवमेंट) की नींव रखी. यह आन्दोलन वर्ष 1789 में हुई फ्रांस की क्रान्ति से बहुत प्रभावित था. इसका मकसद महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा के अधिकार को स्थापित करना था.
धर्म को नस्ल, वर्ण, जाति या किसी भी भेद से ऊपर मानने वाले स्वामी विवेकानंद ने ‘रामकृष्ण मिशन’ की स्थापना की.
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की कोशिशों से हिन्दू पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 बना. वर्ष 1882 में रमाबाई द्वारा ‘आर्य महिला समाज’ नामक संस्था के स्थापना की गयी. इस संस्था ने कई स्थानों पर अनाथालयों का संचालन किया और लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए स्कूलों की स्थापना की.
यह ऐसा दौर था, जब भारत के कुछ हिस्सों में जाति व्यवस्था को समाप्त करने और महिलाओं के साथ भेदभाव करने वाली व्यवस्था और व्यवहार को बदलने के लिए आन्दोलन जोर पकड़ चुके थे.
बीसवीं शताब्दी का सन्दर्भ
महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक ‘मेरे सपनों का भारत’ में लिखा है कि “ग्राम आन्दोलन इसी बात का प्रयत्न है कि जो लोग सेवा की भावना रखते हैं, उन्हें गांवों में बसकर ग्रामवासियों की सेवा में लगने के लिए प्रेरित करके गांवों के साथ स्वास्थ्यप्रद संपर्क स्थापित किया जाए. जो लोग सेवाभाव से गांवों में बसे हैं, वे अपने सामने कठिनाइयों को देखकर हतोत्साहित नहीं होते. वे तो इस बात को जानकर ही वहां जाते हैं कि अनेक कठिनाइयों में, यहां तक कि गांव वालों की उदासीनता के होते हुए भी, उन्हें वहां काम करना है. जिन्हें अपने मिशन पर और स्वयं पर विश्वास है, वे ही गांव वालों की सेवा करके उनके जीवन पर कुछ असर डाल सकेंगे. जो सेवक ग्राम-सफाई का शास्त्र नहीं जानता, खुद भंगी का काम नहीं करता, वह ग्राम सेवा के लायक नहीं बन सकता. जब तक क़ानून से स्त्री और पुरुष के हक़ समान नहीं माने जाते, जब तक लड़की के जन्म का लड़के के जन्म जितना ही स्वागत नहीं किया जाता, तब तक समझना चाहिए कि हिंदुस्तान लकवे के रोग से ग्रस्त है”.
महात्मा गांधी जब दक्षिण अफ्रीका में थे, तब वर्ष 1894 में उन्होंने ‘नटाल इंडियन कांग्रेस’ की स्थापना की. वर्ष 1899 में बोयर युद्ध के दौरान ‘इंडियन एम्बुलेंस कॉर्प’ की स्थापना की. वर्ष 1904 में अपने पहले ‘फिनिक्स आश्रम’ और फिर वर्ष 1910 में दक्षिण अफ्रीका में ही ‘टॉल्सटॉय फ़ार्म’ की स्थापना की. महात्मा गांधी वर्ष 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे. उन्होंने अहमदाबाद के कोचरब में ‘सत्याग्रह आश्रम’ की स्थापना की और विकास की गतिविधियों पर आधारित कार्यक्रमों को आर्थिक तथा संसाधनों की आत्मनिर्भरता के कार्यक्रम की दिशा में मोड़ना शुरू किया. वे गांव-आधारित उद्योगों की व्यवस्था को स्थापित करना और सशक्त बनाना चाहते थे. उनका मानना था कि समाज की व्यवस्था में सुधार के बिना समाज का सशक्तिकरण नहीं हो सकता है. उन्होंने वर्ष 1916 में गुजरात में कपड़ा मिलों के मजदूरों के आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में ‘मजूर महाजन’ नामक संगठन की स्थापना की. वर्ष 1917 में ‘साबरमती आश्रम’, वर्ष 1920 में अहमाबाद में ‘गुजरात विद्यापीठ’, वर्ष 1925 में ‘अखिल भारतीय बुनकर संघ’, वर्ष 1932 में ‘हरिजन सेवक संघ’ और फिर वर्ष 1934 में ‘अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ’ की स्थापना की.
महात्मा गांधी ने जितने सामाजिक नागरिक समूहों और संस्थाओं की स्थापना की, उतने संगठन शायद इतिहास में किसी और व्यक्ति ने स्थापित नहीं किये होंगे. महत्वपूर्ण बात यह है कि हर संस्था या संगठन की स्थापना के पीछे एक रचनात्मक सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक उद्देश्य रहा है. यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि महात्मा गांधी ने उन संस्थाओं का नियंत्रण अपने हाथों में लम्बे समय तक नहीं रखा. समाज में बदलाव के लक्ष्य हासिल करने के लिए मज़बूत नेतृत्व तैयार करने की जरूरत होती है और उन्होंने सामाजिक नागरिक संस्थाओं के माध्यम से ऐसा ही नेतृत्व तैयार किया.
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भारतीय समाज की जाति और लिंगभेद आधारित व्यवस्था को सीधी चुनौती दी थी. जिस ताकत और मज़बूती के साथ उन्होंने संघर्ष किया, उसी का परिणाम था कि वंचित तबकों के साथ होने वाले अमानवीय बर्ताव को समाप्त करने की प्रतिबद्धता भारत के संविधान में स्थापित हुई. डॉ. आंबेडकर ने भी सामाजिक नागरिक संस्थाओं के स्वरूप को अपनाया था. उन्होंने वर्ष 1923 में ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’, वर्ष 1930 में ‘डिप्रेस्ड क्लास फेडरेशन (एसोसियेशन)’, वर्ष 1942 में ‘अनुसूचित जाति संघ’ और वर्ष 1950 में ‘भारतीय बौद्ध महासभा’ की स्थापना की थी. सामाजिक-आर्थिक बदलाव के हर महत्वपूर्ण उपक्रम में सामाजिक नागरिक संस्थाओं के वजूद को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है.
स्वतंत्रता के पश्चात सामाजिक नागरिक पहल के नज़रिए से 1970 के दशक के मध्य में भारत में संचालित हुआ ‘जयप्रकाश नारायण आन्दोलन’ (जिसे सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन की संज्ञा भी दी जाती है) एक महत्वपूर्ण उदाहरण है. हालांकि वर्ष 1972 में भारत में “गरीबी हटाओ” का नारा आ गया था, लेकिन व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ. तत्कालीन केंद्र और राज्य सरकारों (विशेषकर बिहार और गुजरात) पर गैर-जवाबदेहिता, भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के आक्षेप लग रहे थे. वर्ष 1974 में भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और महंगाई जैसी बड़ी चुनौतियों के चलते गुजरात में ‘नवनिर्माण अभियान’ की शुरुआत हुई. गुजरात के एल. डी. कालेज ऑफ इंजीनियरिंग के छात्रों ने महंगाई और फीस में बढ़ोतरी के खिलाफ आन्दोलन शुरू किया. ये विषय महत्वपूर्ण थे और छात्रों एवं युवाओं ने शिक्षा व्यवस्था में बदलाव, मंहगाई, भ्रष्टाचार, असमानता, बेरोज़गारी जैसे मुद्दे भी उठाने शुरु किये. इसका परिणाम यह हुआ कि गुजरात की तत्कालीन चिमन भाई पटेल की सरकार उसी वर्ष गिर गयी.
इसी समय बिहार में बिहार छात्र संघर्ष समिति अस्तित्व में आयी. समाज की अनसुलझी समस्याओं के प्रति सरकार की उदासीनता और उपेक्षा ने युवाओं को संगठित पहल करने के लिए मजबूर किया. यह न तो प्रत्यक्ष रूप से दलीय राजनैतिक पहल थी, न ही मुनाफ़ा कमाने वाले बाज़ार की पहल. युवाओं द्वारा शुरू किये गये आन्दोलन को गांधीवादी कार्यकर्ता जयप्रकाश नारायण का साथ मिला. उस समय वे सर्वोदय और भूदान के काम में जुटे हुए थे. यह तय हुआ कि आन्दोलन पूर्णरूप से अहिंसक होगा. जब आन्दोलन ने व्यापक रूप लेना शुरू किया तब “जन संघर्ष समिति” का गठन हुआ. 5 जून 1974 को जय प्रकाश नारायण ने पटना में “सम्पूर्ण क्रान्ति” का आह्वान किया. यह तय किया गया कि समाज की, लोगों की स्थिति में सुधार लाने के लिए ऐसी सरकार लानी होगी, जो समाज को उसी के नज़रिए से देखे और समझे. तब “जनता सरकार” के विकल्प को सामने रखा गया. देश के ज्यादातर हिस्सों में व्यवस्था के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही थी. जहां-जहां जन आन्दोलन हो रहे थे, उन्हें बर्बरता के साथ दबाने के लिए ताकत का इस्तेमाल किया जा रहा था. तब जन संघर्ष समिति ने तय किया कि यह आन्दोलन देश के कोने-कोने तक पहुंचाया जाएगा. हर जिले में सत्याग्रह करने का निर्णय लिया गया.
यूं तो वर्ष 1976 में आम चुनाव होने ही थे, लेकिन सामाजिक नागरिक पहल जे फलस्वरूप सरकार पर दबाव बढ़ता गया और चुनाव के पहले ही 25 जून 1975 को तत्कालीन सरकार द्वारा देश में “आपातकाल” लगा दिया गया. गरीबी, भ्रष्टाचार, गैर-जवाबदेहिता, लोकतांत्रिक मूल्यों के दमन और बेरोज़गारी के सवाल पर खड़े हुए सामाजिक नागरिक अभियान ने भारत में पहली बार सरकार को ‘आपातकाल” लगाने पर मजबूर कर दिया. इसी आपातकाल ने भारतीयों को स्वतंत्रता और लोकतंत्र के अर्थ को समझने-महसूस करने का मौका भी दिया.
आपातकाल के दौरान भारत में मानव अधिकारों का व्यवस्थागत उल्लंघन होना शुरू हुआ. वास्तव में देखा जाए तो इस समय के आने तक भारत में मानव अधिकारों पर संस्थागत बहस ही नहीं हो रही थी. समाज की समस्याएं ज्यादातर बुनियादी ढांचों और बुनियादी जरूरतों की पूर्ति तक ही सीमित थीं. सबकुछ आर्थिक विकास और सेवाधर्मिता (समाज और राज्य व्यवस्था दोनों ही तलों पर) के आसपास ही केन्द्रित था. वर्ष 1976 में जयप्रकाश नारायण ने ही ‘लोक स्वातंत्र्य संगठन’ (पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज़) की स्थापना की. यह संगठन तब से अब तक भारत में मानव अधिकारों की निगरानी, उनके संरक्षण, जन शिक्षा और न्यायिक पहल के नज़रिए से बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है.
समाज खुद पहल करके सामाजिक नागरिक अभियान का रूप ले लेता है. उत्तराखंड के चमौली के पहाड़ों के जंगल को सरकार ने ठेकेदारों से कटवाना शुरू किया तो लोग पेड़ों का आलिंगन करके खड़े हो गये. इस तरह वर्ष 1973 में चिपको आन्दोलन का जन्म हुआ. इस आन्दोलन में महिलाओं ने बहुत प्रभावी और अहम् भूमिका निभाई थी. उन्होंने ऐसा कर के सन्देश दे दिया था कि जंगल उनके जीवन से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. इस सामाजिक नागरिक पहल में दशौली ग्राम स्वराज संघ ने अहम् भूमिका निभायी थी.
बीसवीं शताब्दी का सन्दर्भ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इस शताब्दी में से आधा भाग स्वतंत्रता के संघर्ष में गया. इसी शताब्दी में भारत का संविधान बना और इसी शताब्दी में भारत ने स्वतंत्र होकर अपने स्वतंत्र स्वरुप को गढ़ना शुरू किया. इसी शताब्दी में जन समस्याओं के चलते बड़े अभियान और आन्दोलन खड़े हुए और जनकल्याणकारी राज्य की अवधारणा के सामने भूमंडलीकरण-निजीकरण की आर्थिक नीतियों को खड़ा किया गया. यह समझना जरूरी है कि देश और दुनिया की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक चुनौतियों से सामाजिक नागरिक संस्थाओं की भूमिका का प्रत्यक्ष जुड़ाव होता है.
इक्कीसवीं शताब्दी के दो हासिल हैं – पहला तो यह कि दुनिया में बदली हुई आर्थिक नीतियों के लिए सामाजिक नागरिक पहल स्वीकार्य नहीं मानी जा रही हैं. बाज़ार और राज्य व्यवस्था, दोनों ही इकाइयां संस्थाओं की भूमिका से असहज हैं. दूसरा हासिल यह है कि सामाजिक नागरिक संस्थाएं बदली हुई आर्थिक और राज्य व्यवस्था के अपने ऊपर पड़ने वाले प्रभावों का आंकलन नहीं कर पाईं.
भारत में सामाजिक नागरिक संस्थाओं और सामाजिक पहल के अवधारणा की एक मज़बूत ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है. भारतीय समाज और व्यवस्था में राज्य और बाज़ार से इतर व्यक्तियों का कोई न कोई समूह रहा है, जो करुणा, मानवीयता और अधिकारों को बेहतर समाज का महत्वपूर्ण सूचक मानता रहा है. सामाजिक और धार्मिक व्यवस्थाओं में समाज कार्य को भी अपनाया गया है.
उपनिवेशकाल के दौरान भारत में समाज की विसंगतियों को दूर करने के लिए क़ानून और व्यवस्थाएं बनाने की मांग उठती रहीं और उन पर कुछ हद तक पहल भी हुई. आज़ादी के आन्दोलन के दौरान ही यह बात उभर कर आने लगी कि सामाजिक बदलाव के बिना हासिल की गयी आज़ादी पूरी आज़ादी नहीं होगी. महिलाओं के अधिकारों, दलितों के साथ होने वाली छुआछूत और अपमानजनक व्यवहार पर हर मंच पर बहस होने लगी.
किसी भी दौर में सामाजिक नागरिक पहल करने वाली संस्थाओं को प्रतिबंधित करने या उनके आत्मविश्वास को कमज़ोर करने की नीति का मतलब है सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया को बाधित करना.
राज्य को समाज, खासकर वंचित और उपेक्षित व्यक्तिओं और समुदायों के प्रति सजग और जवाबदेह बनाने में सामाजिक नागरिक संस्थाओं की प्रभावी भूमिका रही है. इन संस्थाओं का सक्रिय होना ही यह सन्देश देता है कि राष्ट्र में सामाजिक नागरिक पहल के लिए स्थान है.

भारत में सामाजिक नागरिक संस्थाएं – मायने, पहचान और उनका नज़रिया
सचिन कुमार जैन
सामाजिक नागरिक संस्थाएं (सिविल सोसायटी ऑर्गनाइजेशन) वे इकाइयां होती हैं, जो न तो राज्य व्यवस्था का हिस्सा होती हैं, न ही निजी क्षेत्र का. ये संस्थायें समाज की जरूरतों को निरपेक्ष ढंग से बुनियादी मानवीय मूल्यों के नज़रिए से देखने, समझने और पहल करने के मकसद से बनायी जाती हैं.
इन संस्थाओं के विभिन्न स्वरुप होते हैं. मसलन स्वैच्छिक संस्थाएं, पंजीकृत संस्थाएं, ट्रस्ट, गैर-सरकारी संस्थाएं, अपंजीकृत संस्थाएं, संघ और संगठन, यूनियन, अभियान और आन्दोलन, वित्तीय सहायता प्रदान करने वाली संस्थाएं, शोध संस्थाएं, प्रशिक्षण और क्षमता वृद्धि संस्थाएं आदि.
ये संस्थाएं मुख्य रूप से निम्न क्षेत्रों में अपनी भूमिका निभाती हैं –
 समाज के वंचित समूहों/लोगों को सेवाएं प्रदान करना
 समस्याओं के निवारण के लिए मॉडल तैयार करना
 सकारात्मक बदलाव के लिए नवाचार करना
 समुदाय का सशक्तिकरण करना
 शोध और अध्ययन करना
 प्रशिक्षण और क्षमता वृद्धि की पहल करना
 नीतियों में बदलाव के लिए वकालत
 मानव अधिकारों का संरक्षण और स्थिति की निगरानी
 व्यवस्था में मानवीय और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना की पहल
 शोषण, उपेक्षा और असमानता का प्रतिरोध
भारत में संस्था पंजीयन का कानून 160 साल से ज्यादा पुराना है. इसे ‘सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860’ कहा जाता है. स्वतंत्रता के बाद भारत के विभिन्न राज्यों ने संस्थाओं, समितियों, ट्रस्ट के पंजीकरण के लिए अपने-अपने क़ानून बनाये और संस्थाओं के पंजीयन के काम को ढांचागत स्वरुप प्रदान किया. कंपनी पंजीयन अधिनियम में भी अलाभकारी (नॉट फॉर प्रॉफिट) कंपनी गठित करने की व्यवस्था है.
वर्ष 1976 में विदेशी अनुदान लेने के लिए “विदेशी अनुदान विनियमन अधिनियम” (फॉरेन कांट्रीब्युशन रेगुलेशन एक्ट) बनाया गया. इसमें समय-समय पर संशोधन होते रहे हैं.
भारत में उक्त संस्थाओं की परिभाषा भी स्पष्ट नहीं है. मौजूदा कानूनी प्रावधानों में अशासकीय संस्थाएं, ट्रस्ट, मंदिर समिति, गुरुद्वारा, वक्फ़, चर्च, स्कूल, महिला मंडल, युवा मंडल, अलाभकारी कम्पनियां आदि सभी पंजीकृत होते हैं. अतः इन सभी को सामाजिक नागरिक संस्था के रूप में मान्यता मिल जाती है.
यह समझना भी जरूरी है कि उक्त संस्थाओं का एक बड़ा समूह ऐसा भी है, जो किन्हीं कानूनों के तहत पंजीकृत नहीं होता है. बहरहाल उनके अपने दिशानिर्देश और उद्देश्य होते हैं और वे अपने तय लक्ष्यों को हासिल करने के लिए संघर्षरत रहते हैं. जन आन्दोलन और क्षेत्रीय-राष्ट्रीय अभियान ऐसे ही स्वरुप में काम करते हैं.
सामाजिक नागरिक पहल – संस्थाएं बनाम जनआन्दोलन और अभियान
जब हम सामाजिक नागरिक संस्थाओं की बात करते हैं, तब इसके दो पक्ष उभरते हैं. इन पक्षों को स्वीकार करना या अस्वीकार करना जरूरी नहीं है, लेकिन समझना बहुत जरूरी है. क्योंकि यह एक व्यावहारिक बहस है. संस्थाओं और जन आन्दोलनों, दोनों को ही सामाजिक नागरिक पहल के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, लेकिन इनके बीच के चारित्रिक अंतर को समझना जरूरी है.
इस पहलू पर बात करने का उद्देश्य इनके महत्व और प्रभाव की तुलना करना नहीं है. मूल बात यह है कि कौन ज्यादा स्वतंत्रता के साथ काम कर सकता है? संस्थाओं और जन आन्दोलनों में से विसंगतियों के मूल कारणों पर कौन पहल करता है? संसाधनों के सन्दर्भ में समाज के संसाधनों पर कौन निर्भर है और संस्थागत संसाधनों पर कौन ज्यादा निर्भर है? सामाजिक-आर्थिक बदलाव की पहल में समुदाय कहाँ ज्यादा सक्रिय भूमिका में होता है? कौन सा समूह अन्याय, शोषण और असमानता का प्रतिरोध करता है?
भारत में उक्त संस्थाओं को प्रचलित भाषा में गैर-सरकारी संस्था (एनजीओ), स्वैच्छिक संस्था और सामाजिक संस्था कहा जाता है. ये संस्थाएं एक उद्देश्य को लेकर समाज के बीच में काम करती हैं. प्रश्न यह उठता है कि क्या ये संस्थाएं वास्तव में स्वतंत्र रूप से अपने उद्देश्य और लक्ष्य के लिए काम कर पाती हैं? क्या संस्था के निर्णय और प्राथमिकताएं उन्हें मिलने वाली आर्थिक सहायता से प्रभावित नहीं होते हैं? जो संस्था उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान करती है, क्या वह उन्हें स्वतंत्र रूप से अपने नज़रिये के मुताबिक़ काम करने की स्वतंत्रता प्रदान करती है? यह एक सच्चाई है कि उक्त संस्थाओं की प्राथमिकताओं और लक्ष्यों को आर्थिक सहायता प्रदान करने वाली संस्थाओं के विचार और विचारधारा का प्रभाव पड़ सकता है. पूरी दुनिया में, खासकर 1980 के दशक में भूमंडलीकरण की संगठित शुरुआत के बाद अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं (जैसे विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश आदि) ने विकासशील देशों की नई आर्थिक नीतियों और व्यवस्था को आकार देने में सीधी और निर्णायक भूमिका निभाई. जिस तरह की नीतियाँ लागू की जा रही थीं, उनसे किसानों, मजदूरों, आदिवासियों और समाज में असंतोष पैदा होना स्वाभाविक था. उस असंतोष को कमज़ोर करने के लिए विकास की योजनाओं में संस्थाओं की सहभागिता का प्रावधान किया गया. इस प्रक्रिया में सामाजिक संस्थाओं को भी शामिल किया गया, लेकिन यह देखा गया कि चर्चाओं-संवादों में ऐसी संस्थाओं की सहभागिता ज्यादा रही, जो भूमंडलीकरण की नीतियों से कम या ज्यादा हद तक सहमत थे. जो संस्थाएं असहमत थीं, उन्हें संवादों में शामिल नहीं किया गया. दूसरी बात यह भी उभरी कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं ने अलग-अलग साझेदारों और संस्थाओं को संवाद में शामिल जरूर किया, लेकिन उन संवादों के निष्कर्ष पहले से ही तैयार करके रखे गए थे और ज्यादातर को ज्यों का त्यों ही लागू किया गया.
वास्तव में उक्त संस्थाओं की भूमिका को वैश्विक आर्थिक राजनैतिक सन्दर्भ में समझने की जरूरत होती है. यह प्रश्न हमेशा से मानक प्रश्न रहा है और प्रासंगिक भी कि सामाजिक संस्थाओं के आर्थिक संसाधनों के स्रोत क्या हैं? उदाहरण के लिए यह देखा जा रहा है कि भारत में खनन का काम करने वाले व्यापारिक प्रतिष्ठान सामाजिक संस्थाओं को “विकास और बदलाव के लिए” आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं. इन प्रतिष्ठानों के कारण जल स्रोत दूषित हो रहे हैं, लोग बीमार पड़ रहे हैं, पर्यावरण को गंभीर नुक्सान पहुँच रहा है. ऐसे में क्या संस्थाएं समाज की इन समस्याओं के बारे में आवाज़ उठा पाएंगी? क्या इन मूल कारणों को सामने लाने की पहल करेंगी, जो लोगों की बीमारी का कारण बन रहे हैं? आज कोई बड़ा औद्योगिक समूह देश भर में निजी शिक्षण संस्थान संचालित कर रहा है, तो क्या संस्थाएं ऐसे समूहों से आर्थिक सहायता लेकर समान शिक्षा प्रणाली या सबके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार के लिए वकालत कर पाएंगी? इतना ही नहीं, अगर सरकार से आर्थिक अनुदान लेकर अपने कार्यक्रम संचालित करती हैं, तो क्या फिर वे सरकार की विसंगतिपूर्ण नीतियों का प्रतिरोध या आलोचना कर पाएंगी? यह सामाजिक संस्थाओं के सामने नैतिक दुविधा खड़े करने वाले प्रश्न हैं. ऐसी स्थिति में लगता है कि सामाजिक संस्थाएं महज विकास की योजनाओं के क्रियान्वयन में सहयोगी भूमिका निभाने वाली इकाइयां बन जाती हैं, जो असमानता, अन्याय और गरीबी के मूल कारणों पर सीमित काम ही कर पाती हैं.
अब तो सरकार ही अनुदान का सबसे बड़ा स्रोत है. इसका मतलब है – ऐसी स्थिति में राज्य की नीतियों, उनकी कार्यशैली, राज्य के द्वारा किये जाने वाले दमन और योजनाओं की प्रभावी आलोचना करने की स्वतंत्रता का सीमित होना.
सामाजिक नागरिक क्षेत्र में समूहों/संस्थाओं का एक स्वरुप है – जन आन्दोलन और अभियान का. मुख्य रूप से सामाजिक आन्दोलन और अभियान ऐसी पहल होते हैं, जिसमें लोगों की, समाज की, समस्या से प्रभावित लोगों की सीधी और सक्रिय भूमिका होती है. जब लोग खुद समस्या को पहचान कर संगठित होते हैं, उसके मूल कारणों को समझकर बदलाव की पहल करते हैं, तब उस पहल को जन आन्दोलन कहा जाता है. ऐसी पहल करने के लिए जो संस्थागत स्वरुप उभरता है, वह जन संगठन होता है. वास्तव में जन संगठन राज्य व्यवस्था और समाज के मूल चरित्र को समझते हुए पहल करते हैं. इसमें उनकी कार्यवाही के लिए संसाधनों का सबसे प्रमुख स्रोत लोगों का समूह ही होता है. जो लोग संघर्ष कर रहे होते हैं, वे स्वयं अपने योगदान देते हैं. इसके साथ ही समाज में एक बहुत बड़ा तबका ऐसा होता है, जो उनके नज़रिए और संघर्ष से सरोकार रखता है. वे लोग भी अपनी तरफ से योगदान देते हैं.
वास्तव में सामजिक संस्थाओं और जन संगठनों के बीच दूरी रही है. जन संगठन और जन आन्दोलनों की यह मान्यता रही है कि गैर-सरकारी संस्थाएं व्यवस्थागत बदलाव के लिए पहल करने के लिए तैयार नहीं होती हैं. चूंकि वे विभिन्न संस्थागत स्रोतों से आर्थिक अनुदान लेती हैं, इसलिए उनकी प्रतिबद्धता कमज़ोर पड़ जाती है. उनका यह भी सोचना रहा है कि जन आन्दोलन आरामदायक माहौल में नहीं किये जाते हैं, इसके लिए उन कठिन परिस्थितियों में जीवन जीना होता है, जिनमें समुदाय के लोग रहते हैं.
सामाजिक नागरिक संस्थाओं का फैलाव
नीति आयोग ने सामाजिक नागरिक संस्थाओं (पंजीकृत) को एक मंच पर लाने के लिए “दर्पण पोर्टल” नामक मंच तैयार किया था. 2 मई 2022 की स्थिति में नीति आयोग के “दर्पण पोर्टल” पर 43 विषयों/क्षेत्रों पर कुल 1,39,712 संस्थाएं पंजीकृत थीं. ये संस्थाएं एक से ज्यादा विषयों पर काम कर रही हैं. इनमें से कृषि के क्षेत्र में 33,182, लोक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के क्षेत्र में 53,805, ग्रामीण विकास और गरीबी उन्मूलन के लिए 35,057, महिला सशक्तिकरण के लिए 47,893, शिक्षा और साक्षरता के लिए 80,322, बच्चों के अधिकारों के लिए 50,491, दलितों के उत्थान के लिए 18,717, युवाओं के लिए 24,676, पर्यावरण और वन संरक्षण के लिए 37,013, आदिवासियों के विकास के लिए 16,250, पोषण के लिए 16,951, शहरी विकास और गरीबी उन्मूलन के लिए 17,980 और दिव्यांगों के सशक्तिकरण के लिए 22,363 संस्थाएं सक्रिय हैं.
अगर राज्यवार आंकड़े देखें तो नीति आयोग के दर्पण पोर्टल के मुताबिक़ उत्तरप्रदेश से सबसे ज्यादा 19,760 और महाराष्ट्र से 19,026 संस्थाएं दर्ज हैं. इसके साथ ही पश्चिम बंगाल से 10,509, दिल्ली से 10,800, तमिलनाडु से 9,804, मध्यप्रदेश से 6,598, गुजरात से 6,787, राजस्थान से 5,260, बिहार से 4,837 और ओडिशा से 4,080 संस्थाएं इस पोर्टल पर दर्ज हैं.
एक अन्य सन्दर्भ है सामाजिक नागरिक संस्थाओं को आयकर अधिनियम के तहत मिलने वाली छूट का. अप्रैल 2022 की स्थिति में भारत में 2,20,225 संस्थाएं आयकर अधिनियम के तहत सामाजिक संस्था के रूप में पंजीकृत हैं, जिन्हें आयकर में छूट मिलती है.
इन आंकड़ों से क्या चित्र उभरता है? स्पष्ट चित्र तो यही है कि भारत में सामाजिक नागरिक संस्थाओं का व्यापक फैलाव है, ये संस्थाएं सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों और सभी राज्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. लेकिन इसके बावजूद उनके बारे में सामान्य धारणा सकारात्मक नहीं है. उनके बारे में यही माना जाता है कि यह क्षेत्र गैर-जवाबदेह है.
एक मिथक वर्ष 2009 में यह बताकर रचा गया था कि भारत में लगभग 32 लाख सामाजिक नागरिक संस्थाएं हैं. उनमें से कईयों का वजूद नहीं है. यह आंकड़ा केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन ने जारी किया था. भारत में जिन नियमों और कानूनों के तहत सामाजिक संस्थाओं का पंजीयन किया जाता है, उन्हीं के तहत वक्फ, स्कूल, गुरुद्वारा, मंदिर, मस्जिद, यूनियन, महिला मंडल आदि सभी दर्ज होते हैं, अतः भारत में सामाजिक-आर्थिक बदलाव के लिए काम करने वाली संस्थाओं के दायरे को वास्तविक स्वरुप में पहचान पाना बहुत कठिन है.
फिर वर्ष 2012 में केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय, भारत सरकार) ने सभी पंजीकृत संस्थाओं की गणना करवाई. इससे पता चला कि देश में पंजीकृत कुल 32 लाख संस्थाओं में से 22 लाख संस्थाओं का भौतिक सत्यापन किया गया. इनमें से 6.94 लाख संस्थाओं को अपने स्थान पर पाया गया. इसका मतलब यह हो सकता है कि लगभग 31 प्रतिशत संस्थाएं ही वजूद में पायी गयीं. लेकिन यह तथ्य नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता है कि इस परिभाषा में मंदिर-मस्जिद का सञ्चालन करने वाली लाखों समितियां भी शामिल होती हैं. वास्तव में यह एक भ्रमित करने वाला कथानक है.
सामाजिक नागरिक संस्थाएं और विचारधाराएँ
सामाजिक नागरिक संस्थाओं का स्वाभाविक आधार “विचार” जरूर होते हैं, लेकिन उनकी प्रभावशाली भूमिका के चलते उसमें ”धाराएँ” भी जुड़ती गयीं हैं. स्वतंत्रता के बाद से यह बुनियादी लक्ष्य रहा कि किस तरह से आर्थिक विकास की प्रक्रिया को मज़बूत बनाया जाए. जो भी प्रक्रियाएं चलीं, उनमें “विचारधाराएँ” इतनी महत्वपूर्ण नहीं रहीं, जितने कि “आदर्श और विचार” महत्वपूर्ण रहे. इसके लिए गांधीवादी विचार को सर्वोदय के रूप में प्रस्तुत किया गया.
वर्ष 1960 के दशक में जब आर्थिक विकास के लिए विदेशी सहायता आना शुरू हुई, तभी से “विचारों” से आगे बढ़कर विचारधाराओं का संघर्ष शुरू हुआ. इस प्रक्रिया में “अनुदान या आर्थिक सहायता की मंशा” पर बहस होने लगी. भारत में कृषि क्षेत्र में ‘हरित क्रान्ति’ के सन्दर्भ में यह बहस और ज्यादा स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आई.
भारत में उक्त संस्थाओं के सन्दर्भ में एक विचारधारा “वामपंथी” मानी जाती है. जिसमें संसाधनों पर लोगों के नियंत्रण की वकालत की जाती है. संसाधनों के समान वितरण को एक अहम् लक्ष्य माना गया. यह विचार भारत की राज्य व्यवस्थाओं को स्वीकार नहीं रहा है. इस विचार में व्यक्ति और समुदाय की पहचान का संरक्षण एक महत्वपूर्ण पहलू है. मसलन आदिवासी समुदाय की अपनी स्वतंत्र पहचान है और उसका संरक्षण किया जाना चाहिए.
दूसरी विचारधारा “दक्षिणपंथी” मानी गयी. जिसमें धर्म और परम्परागत संस्कृति पर आधारित विचार को विकास का आधार माना जाता है. इस विचार में समाज में मौजूद सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक अंतर्द्वंद और विसंगतियों को चुनौती नहीं दी जाती है.
सामाजिक नागरिक संस्थाओं में एक विचार “विकास” पर ही केन्द्रित रहता है. इसमें माना जाता है कि समाज से वंचितपन, गरीबी और अभाव की स्थिति को हटाने की पहल की जाए. इसमें “विचारधारा” का कोई विशेष आग्रह नहीं रहता है.
अब हम देखते हैं कि उक्त संस्थाओं का एक बड़ा समूह है, जो संवैधानिक मूल्यों को आधार बनाकर समुदायों के बीच में काम करती हैं. इसमें लैंगिक भेदभाव, जाति या धर्म के आधार पर दुराग्रह रखते हुए व्यवहार करने वाली व्यवस्था को चुनौती दी जाती है.
भारत का संविधान भारत में संघ और संगठन निर्माण को “मूलभूत” अधिकार का दर्ज़ा देता है. लोग एकजुट हो सकते हैं, इकठ्ठा हो सकते हैं और रचनात्मक या संघर्ष का काम कर सकते हैं. इसी संवैधानिक व्यवस्था के चलते सामाजिक नागरिक संस्थाओं को स्वीकार्यता मिलती है. लेकिन पिछले पांच दशकों में भारत में राजनीतिक दलों और सरकारों ने सामाजिक नागरिक संस्थाओं को अपने आलोचलक और विरोधी के रूप में देखा है. जब 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में सम्पूर्ण क्रान्ति का आन्दोलन हुआ था, उसने तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के सामने बहुत असहज बनाने वाली स्थितियां निर्मित कर दी थीं. उस वक्त यूँ ही सरकार के प्रति समाज में असंतोष बढ़ रहा था, लेकिन सरकार यह मान रही थी लोगों में सरकार के प्रति “असंतोष” सामाजिक नागरिक संस्थाओं ने पैदा किया है. इन परिस्थितियों में सरकार ने जयप्रकाश नारायण को सीआईए का एजेंट तक करार दिया था. सीआईए अमेरिका की गुप्तचर संस्था है और बार-बार सामाजिक नागरिक संस्थाओं के बारे में यह सामान्य वक्तव्य दिया जाता रहा है कि सामाजिक नागरिक संस्थाएं सी आई ए या विदेशी ताकतों के एजेंट के रूप में काम करती हैं. कोशिश यह रही है कि उक्त संस्थाओं की विश्वसनीयता और वैधानिकता को चोट पहुंचाई जा सके. आर्थिक संसाधन देने वाली संस्थाएं और सरकार भी यह दबाव बनाने में शामिल होती हैं.

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भारत में सामाजिक नागरिक संस्थाओं की आधारभूत भूमिकाएं
सचिन कुमार जैन
सामाजिक नागरिक संस्थाएं और उनकी समाज के बारे में समझ
आजकल बहुत आसानी से सामाजिक नागरिक संस्थाओं की प्रतिबद्धता और उनकी समाज कल्याण में भूमिका को चुनौती दी जा रही है. लेकिन हम सबको एक बार अपने आप से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि समाज में महिलाओं की दोयम दर्जे की स्थिति और उनके साथ होने वाले शोषण की ढांचागत व्यवस्था को किसने उजागर किया? सरकारों, राजनीतिक दलों और समाज ने या फिर उक्त संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने? समाज में तीसरे लिंग के व्यक्तिओं/समुदाय के जीवन के पहलुओं पर किसने पहल शुरू की? सरकारों और समाज ने या फिर सामाजिक नागरिक संस्थाओं, राजनीतिक दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने? स्वास्थ्य और शिक्षा हर व्यक्ति का अधिकार बनें, इसके लिए किसने पहल की? सरकारों, राजनीतिक दलों और समाज ने या फिर सामाजिक नागरिक संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने? समाज के वंचित समुदायों के साथ होने वाले भेदभाव और छुआछूत की सच्चाई को किसने उजागर करके बदलाव की पहल की? सरकारों, राजनीतिक दलों और समाज ने या फिर सामाजिक नागरिक संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने? नदियों, पहाड़ों, जंगलों यानी व्यापक पर्यावरण की कीमत पर आर्थिक विकास न किया जाए, इस प्रश्न को उठाने की पहल किसने की? सरकारों, राजनीतिक दलों और समाज ने या फिर सामाजिक नागरिक संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने? जेलों में विभिन्न अपराधों की सज़ा भुगत रहे कैदियों को अमानवीय स्थितियों में न रखा जाए, यह विषय किसने उठाया? सरकारों, राजनीतिक दलों और समाज ने या फिर उक्त संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने? भारत का इतिहास और सांस्कृतिक पहचान सहिष्णुता, करुणा, सत्य, अहिंसा और सह-अस्तित्व के मूल्यों से गढ़ी गई है, लेकिन निहित राजनीतिक हितों के लिए समाज में बंटवारे और बिखराव की राजनीति स्थापित की जा रही है. इस विसंगतिपूर्ण राजनीति को किसने चुनौती दी? सरकारों और समाज ने या फिर उक्त और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने?
एक नागरिक, एक इंसान और एक सभ्य जीव के रूप में यह सोचा जाना चाहिए कि उपरोक्त मुद्दों पर सामाजिक नागरिक संस्थाओं द्वारा की गई कोशिशें भारत और भारत के समाज के खिलाफ हैं या बेहतर भारत के निर्माण की मंशा से की गई कोशिशें हैं? जिस तरह समाज में भी एक वर्ग-एक समूह भ्रष्ट, अनैतिक और दुराचारी होता है, लेकिन हम इनके कारण पूरे समाज और पूरी राजनीतिक व्यवस्था को खारिज नहीं कर देते हैं, उसी तरह सामाजिक नागरिक संस्थाओं में भी एक वर्ग-एक समूह इस तरह की पृवत्ति वाला हो सकता है और उनके कारण सामाजिक नागरिक संस्थाओं के वजूद और उनकी भूमिका को खारिज नहीं किया जा सकता है.
नयी आर्थिक नीतियों का सन्दर्भ – संघर्ष और निर्माण
भारतीय सन्दर्भों में सामाजिक आर्थिक बदलाव में सामाजिक नागरिक समूहों और आन्दोलनों की भूमिका तो हम स्पष्ट रूप से देख ही सकते हैं, लेकिन कुछ बेहद महत्वपूर्ण प्रयोगों ने यह साबित किया है कि सामाजिक नागरिक पहल के नज़रिए में संघर्ष और निर्माण की साझा प्रतिबद्धता होना चाहिए. मध्यभारत के छत्तीसगढ़ क्षेत्र में (जो अब एक राज्य है) 1980 के दशक में शंकर गुहा नियोगी ने मजदूरों के हकों के लिए आन्दोलन खड़ा किया. शंकर गुहा नियोगी ने दल्ली-राजहरा की खदानों के मजदूरों के साथ छत्तीसगढ़ खदान मजदूर संघ और ग्रामीण श्रमिक संघ के गठन के माध्यम से मजदूरों और ग्रामीण समाज के लिए संघर्ष की शुरुआत की थी. संघर्ष की यह प्रक्रिया आर्थिक-राजनीतिक नज़रिए से प्रभावित थी और आगे चल कर इसी नज़रिए का विस्तार छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के गठन के रूप में हुआ. मजदूरों को बेहतर मजदूरी, काम की बेहतर स्थितियां, स्वास्थ्य और शिक्षा का अधिकार, शराब पर नियंत्रण सरीखे मुद्दों पर लोगों को एकजुट और संगठित किया.
छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा का अनुभव बताता है कि सामाजिक-आर्थिक बदलाव को राजनीतिक प्रक्रियाओं से अलग करके नहीं देखा जा सकता है. अगर हमें समस्यायों का हल हासिल करना है तो हमें अपनी राजनीतिक व्यवस्था में जनपक्षधरता लाना होगी. चूंकि लोकतंत्र में व्यवस्था का आधार नीतियां और क़ानून होते हैं, और नीतियों और कानूनों का निर्माण जनप्रतिनिधि करते हैं, जिनका चुनाव लोगों को करना होता है. अतः यह जरूरी है कि हम राजनीतिक मूल्यों और सही प्रतिनिधियों के चुनाव में अपनी भूमिका को समझें. शंकर गुहा नियोगी के विचार ने यह बताया कि जब सामाजिक नागरिक आन्दोलन संघर्ष के साथ ही निर्माण के विचार को भी लागू करते हैं, तब संघर्ष और बदलाव के काम में ऊर्जा बनी रहती है. नए विचार आते रहते हैं और संघर्ष का काम ज्यादा व्यावहारिक हो जाता है. उन्होंने वास्तव में विचारधारा ही बदलने की बात की थी. अब तक यही माना जाता रहा है कि समाज में निर्माण का हर काम शासन या सत्ता द्वारा कराया जाता है, इसमें समाज की कोई भूमिका नहीं रहती है. उन्होंने यह पहल की कि यदि समाज खुद निर्माण के काम में जुटे तो उसकी शासन पर से निर्भरता कम हो सकती है और इससे शोषण पर लगाम लगाई जा सकती है.
लगभग यही समय था, जब ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ अस्तित्व में आया. मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी पर बनने वाले बांधों के कारण समाज, संस्कृति और पारिस्थितिकी को हाने वाले नुकसानों को जानते-समझते हुए, वैकल्पिक विकास की अवधारणा पर बहस शुरू हुई. नदियों पर बाँध बनने से मानव समाज और प्रकृति को कितना आघात लगता है, यह बात नर्मदा बचाव आन्दोलन ने 1980 के दशक में बताना शुरू कर दी थी. यह बात बीस-तीस सालों बाद देश और दुनिया के विशेषज्ञों को समझ में आना शुरू हुई.
भारत में अगला बदलाव आया वर्ष 1991 में जब भारत ने अपनी आर्थिक नीतियों को बुनियादी रूप से बदलने का निर्णय लिया. सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया का आर्थिक-राजनैतिक नक्शा तेज़ी से बदल रहा था. भारत भी इससे प्रभावित हुआ था. देश के सामने खड़े आर्थिक संकट को भारत ने अपनी असल पूंजी यानी लोग, समाज, प्राकृतिक संसाधन, विकेंद्रीकरण से सुलझाने के बजाय “बाज़ार केन्द्रित” नीति को तवज्जो दी. यह मान लिया गया कि भारत को अब अपने बाज़ार (यानी उत्पादन, भण्डारण, प्रसंस्करण, सेवाएं, तकनीक आदि) वैश्विक बाज़ार के लिए खोल देने चाहिए. यह नीति स्वीकार कर ली गयी कि किसी भी देश से कोई भी यहां पूंजी निवेश (कुछ क्षेत्रों को छोड़ कर) कर सकता है और मुनाफा कमा सकता है. भारत में किया जाने वाला उत्पादन भी दुनिया के दूसरे देशों को निर्यात किया जा सकता है और दूसरे देशों का उत्पाद भारत में आयात किया जा सकता है. इसके लिए आयात-निर्यात के नियम शिथिल किये जाने लगे. इसे भूमंडलीकरण कहा गया.
भूमंडलीकरण की स्थिति में स्वाभाविक है कि भारत को अपनी आर्थिक नीतियों, नियमों, कानूनों और व्यवस्था में बदलाव करने के लिए भी बाध्य होना था. आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया के तहत ये बदलाव लाये गये. सुधारों का महत्वपूर्ण हिस्सा था निजीकरण को बढ़ावा देना. तब तक भारत में कई क्षेत्रों, मसलन बैंकिंग सेवाओं, बीमा, कोयले, पेट्रोल, खनिज, अधोसंरचना का निर्माण, ऊर्जा, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि में सरकार का नियंत्रण था. नयी आर्थिक नीतियों के तहत तय किया गया कि अब लगभग सभी क्षेत्र निजी क्षेत्रों के लिए खोल दिए जायेंगे. यानी सरकार सेवाएं देने या उत्पादन करने की भूमिका कम से कम निभाएगी. तब निजी क्षेत्र ने अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय खोलने शुरू किये. कोयले और खनिजों की खदानें निजी कंपनियों को दी जाने लगीं. निजी बीमा और बैंकिंग कंपनियां स्थापित हुईं. कई क्षेत्रों में जबरदस्त निजीकरण हुआ. कई उत्पाद (जैसे कपास) विदेशों से सस्ती दर पर भारत आने लगे, इससे उनका देसी उत्पादन प्रभावित होने लगा.
इन आर्थिक नीतियों का दूसरा असर यह हुआ कि “राज्य” ने समाज के प्रति अपनी भूमिका सीमित करनी शुरू कर दी. स्वाभाविक सी बात है कि निजी अस्पताल गरीबों और वंचितों को तो मुफ्त इलाज़ मुहैय्या नहीं करवाएंगे या फिर निजी स्कूल वंचित तबकों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध नहीं करवाएंगे. यह सवाल भी खड़ा हुआ कि लोगों को रोज़गार कौन देगा? नयी तकनीकों के इस्तेमाल से रोज़गार के अवसर कम होने लगे और अब सरकार ने भी नयी आर्थिक नीतियों का हवाला देकर जनकल्याणकारी नीतियों को छोड़ना शुरू कर दिया था. एक मायने में “राज्य” अब अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को छोड़ने लगा था.
इन परिस्थितियों में उक्त संस्थाओं की भूमिका नये सिरे से परिभाषित होने लगी. स्वास्थ्य, शिक्षा, खाद्य सुरक्षा, रोज़गार आदि के बिना जीवन जीने का मूलभूत अधिकार सुरक्षित नहीं हो सकता था. तब सामाजिक नागरिक संस्थाओं ने मानव अधिकारों के नज़रिए से समाज और खासकर वंचित तबकों के मूलभूत अधिकारों के संरक्षण के लिए संगठित पहल करना शुरू की. अब सामाजिक-आर्थिक बदलाव की पहल को “अधिकार आधारित नज़रिए” से देखा-समझा जाने लगा.
इस दौर में संस्थाओं ने दो तरीकों से अपनी भूमिका को परिभाषित किया – संघर्ष और निर्माण. राज्य की नीतियों में समाज और देशज संसाधनों का संरक्षण नहीं, बल्कि इनका दोहन महत्वपूर्ण था. ढांचागत विकास (बांध, सड़क, बड़े उद्योगों का समूह आदि) के कारण गांवों और जंगलों के बीच रहने वाले परम्परागत समाज का विस्थापन शुरू हुआ. देश के वंचित और गरीब लोगों को मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं देना राज्य की प्राथमिकता में नहीं रहा. ऐसे में सामाजिक नागरिक संस्थाओं ने समाज के गरिमामय जीवन के अधिकार के लिए संघर्ष की नीति को अपनाया.
भारत के सामने गरीबी, बेरोज़गारी और सामाजिक आर्थिक असमानता की चुनौतियां मौजूद थीं और सरकार इन्हीं समस्याओं के निराकरण के लिए आर्थिक नीतियों की पक्षधर बनी. इसके दूसरी तरफ सामाजिक नागरिक संस्थाओं का विचार था कि समाज केन्द्रित नज़रिए से विकास की योजनायें बनाकर और संसाधनों के समान वितरण से गरीबी, बेरोज़गारी, भुखमरी और सामाजिक-आर्थिक असमानता को मिटाया जा सकता है. अपने इसी विचार को स्थापित करने के लिए सामाजिक नागरिक संस्थाओं ने समुदाय के बीच जमीनी स्तर पर मॉडल बनाने शुरू किये.
राहत और पुनर्वास का सन्दर्भ
विगत 30 वर्षों में भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं से प्रभावित लोगों को राहत और पुनर्वास सहायता पहुंचाने में उक्त संस्थाओं की व्यापक भूमिका सामने आयी है. लातूर और भुज के भूकंप, उत्तराखंड और कश्मीर की बाढ़ और लगातार बन रही सूखे की स्थितियों में सामाजिक नागरिक संस्थाओं ने आपदा से प्रभावित समुदायों को तत्काल सहायता उपलब्ध करायी है. यह एक स्थापित तथ्य है कि सामाजिक नागरिक संस्थाएं सामाजिक व्यवस्था को बेहतर तरीके से जानती-समझती हैं, इसलिए उन्हें समुदाय के बीच पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगता है और यही पहुंच आपदा के समय सबसे महत्वपूर्ण होती है.
उक्त संस्थाओं ने विभिन्न स्तरों पर सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों का मज़बूत आधार बनाया है. यही आधार आपातकालीन स्थितियों और आपदाओं के दौरान लोगों को मदद पहुंचाने में एक शक्ति के रूप में काम करता है. वर्ष 1999 के ओडिशा के चक्रवात (सायक्लोन) में उक्त संस्थाओं ने आपदा प्रभावित लोगों को न केवल तत्काल भोजन और दवाइयां उपलब्ध करवाई थीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था भी खड़ी की थी. तब उजड़े हुए घरों को फिर से बनाने में भी उक्त संस्थाओं ने सीधी भूमिका निभायी थी.
कोविड 19 की महामारी के दौरान उक्त संस्थाओं ने नागरिकों को तत्काल राहत पहुंचाने में सीधी भूमिका निभायी. महामारी के शुरू होते ही लगाये गये राष्ट्रव्यापी बंद के दौरान भोजन, पलायन करने वाले मजदूरों के लिए परिवहन की व्यवस्था, गंभीर रूप से बीमार लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने में सामाजिक नागरिक संस्थाओं ने रचनात्मक भूमिका निभायी.
हम यह देख सकते हैं कि अब उक्त संस्थाएं केवल संघर्ष और निर्माण की भूमिका ही नहीं निभातीं, बल्कि राहत और पुनर्वास में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है. इस भूमिका को इसलिए नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है क्योंकि अब समाज किसी न किसी आपदा से प्रभावित होता ही है. कभी बाढ़, कभी सूखा, चक्रवात और कभी साम्प्रदायिक टकराव. इन सभी स्थितियों में सामाजिक नागरिक संस्थाओं की भूमिका बनती ही है.
न्यायिक प्रक्रियाओं का सन्दर्भ
नयी आर्थिक नीतियों ने भारत के राजनीतिक चरित्र को भी बदल दिया. समाज की मूलभूत आवश्यकताएं दूसरे स्थान पर और निजी क्षेत्र की आकांक्षाएं नीतिगत प्राथमिकताओं में पहले क्रम पर रहती हैं. ऐसी स्थिति में “न्यायपालिका” एक महत्वपूर्ण सहारा बनी. उक्त संस्थाओं और कार्यकर्ताओं ने संविधान द्वारा दिए गये न्याय के अधिकार के आधार पर जनहित याचिकाओं के माध्यम से समाज की मूलभूत अधिकारों के संरक्षण की पहल की. राजस्थान में भंवरी देवी के साथ लैंगिक हिंसा और यौन शोषण हुआ था. राज्य व्यवस्था ने उन्हें न्याय नहीं दिलाया. वर्ष 1984 में ‘बंधुआ मुक्ति मोर्चा’ द्वारा दायर याचिका के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय ने बाल श्रम को समाप्त करने के निर्देश दिए और तब बाल श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 बना. वर्ष 1992 में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि लैंगिक शोषण संविधान द्वारा दिए गये, समानता, जीवन जीने और स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकार का हनन है और तब महिलाओं के साथ होने वाली लैंगिक/यौन हिंसा को रोकने के लिए व्यवस्थाएं बनीं. इस याचिका में 5 सामाजिक नागरिक संस्थाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.
वेल्लोर सिटिज़न वेलफेयर फोरम की याचिका में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि टिकाऊ विकास की अवधारणा को पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी स्टॉकहोम घोषणा और रियो घोषणा के आलोक में देखना होगा. यह भी माना कि यह वैश्विक पारम्परिक कानूनों का हिस्सा है. अतः विकास को पारिस्थितिकी/पर्यावरण से सम्बंधित पहलुओं से जोड़ कर देखा जाना चाहिए. न्यायालय ने निर्देश दिया कि जो भी इकाई प्रदूषण फैलाती है, वह इसके लिए नियमानुसार भुगतान करेगी.
सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन के न्यायालयीन प्रकरण में यह कहा गया कि रेडियो तरंगों के लाइसेंस (2 जी) का आवंटन मानक प्रक्रिया और मापदंडों पर नहीं हुआ है. इसके परिणाम स्वरुप पूर्व जारी किये जा चुके लाइसेंस रद्द किये गये और नये सिरे से प्रक्रिया संचालित हुई.
बिच्चरी गांव की तरफ से इंडियन काउंसिल फॉर एनवायरो-लीगल एक्शन ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि वहां स्थापित एक कारखाने से विषैले रसायन निकलते हैं लेकिन सरकार ने नागरिकों को स्वस्थ पर्यावरण उपलब्ध करवाने के अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए कोई कदम नहीं उठाये. इस पर न्यायालय ने सम्बंधित इकाई पर भारी जुर्माना लगाया.
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ की याचिका पर खाद्य सुरक्षा/भोजन के अधिकार को जीवन जीने के मूलभूत अधिकार का हिस्सा माना गया.
परमानंद कटारा एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. उन्होंने अखबार में एक खबर पढ़ी कि एक स्कूटर चालक को तेज़ गति से चलती कार ने टक्कर मार दी. उस व्यक्ति को अस्पताल ले जाया गया, किन्तु वहां के चिकित्सक ने उसका इलाज़ करने से इनकार करते हुए उसे 20 किलोमीटर दूर दूसरे अस्पताल भेज दिया क्योंकि यह एक कानूनी मामला था. परमानंद कटारा ने अदालत में याचिका दायर की. इसके आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि व्यक्ति के जीवन की सुरक्षा सर्वोपरि है. सरकारी अस्पताल के चिकित्सक या अन्य किसी भी चिकित्सक की यह पेशेवर जिम्मेदारी है कि वह व्यक्ति का जीवन बचाये.
इसी तरह नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने जन आन्दोलन न्यायिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ही यह सच्चाई स्थापित की है कि बड़ी विकास परियोजनाओं में परियोजनाओं से प्रभावित लोगों और परिवारों का उचित पुनर्वास नहीं होता है.
सामाजिक नागरिक पहल और संस्थाओं की राजनीतिक भूमिका
1970 के दशक में जब संस्थाओं ने जन आन्दोलन व्यवस्था में परिवर्तन के आन्दोलन को खड़ा किया था, उससे राज्य व्यवस्था और राजनीतिक दलों के सामने पहचान और विश्वसनीयता का संकट खड़ा हो गया था. तभी से सरकारों ने यह कोशिश की है कि सामाजिक नागरिक संस्थाओं को राजनीतिक पहल करने से रोका जाए. इस विचार को लागू करने के लिए यह तर्क गढ़ा गया कि जो भी सामाजिक नागरिक संस्थाएं राजनीतिक गतिविधियाँ करेंगी, उन्हें संस्था संचालन से सम्बंधित क़ानून के उल्लंघन का दोषी माना जाएगा. लेकिन कभी भी यह परिभाषित नहीं किया गया कि वास्तव में “राजनीतिक गतिविधिओं” की परिभाषा क्या है? क्या चुनाव लड़ना या लड़वाना या चुनाव में किसी राजनीतिक दल या उम्मीदवार की मदद करना ही राजनीतिक गतिविधि है या फिर आम लोगों के अधिकारों की आवाज़ उठाने के लिए प्रतिरोध करना या सत्याग्रह करना भी “राजनीतिक गतिविधि” है? वर्तमान सन्दर्भों में तो देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का विश्लेषण करना या लोगों की समस्यायों के नीतिगत पहलुओं की आलोचना करना भी “राजनीति गतिविधि” माना जाता है. अब तो प्रचलित और सत्तारूढ़ राजनैतिक विचार से असहमत होना भी गंभीर अपराध की श्रेणी में आने लगा है.
राजनीतिक गतिविधियों वाले पहलू ने उक्त संस्थाओं के समूह को असमंजस में डाल रखा है. यह बात तो समझ आती है कि सामाजिक नागरिक संस्थाएं चुनावी राजनीति में शामिल न हों, राजनीतिक दलों के रूप में या उनसे सम्बंधित काम न करें, लेकिन व्यवस्था में बदलाव की हर पहल को राजनैतिक गतिविधि मान लिया जाना लोकतांत्रिक नज़रिए से विसंगतिपूर्ण नीति है. यह समझना जरूरी है कि लोकतंत्र में सामाजिक-आर्थिक बदलाव और व्यवस्था में सुधार राजनीतिक प्रक्रियाओं से ही होते हैं.
क़ानून के राज की स्थापना
संस्थाएं मूलतः यह मानती हैं कि भारत के संविधान में जिन मूल्यों, मूलभूत अधिकारों और राज्य की नीति के निर्देशक तत्वों का उल्लेख है, उनके मुताबिक़ भारत की राज्य व्यवस्था का निर्माण हो और समाज उन व्यवस्थाओं का पालन करे. विगत तीन दशकों में, जब से भारतीय राज्य ने जनकल्याणकारी राज्य की अपनी भूमिका को सीमित करना शुरू किया है, तबसे यह महत्वपूर्ण माना जाने लगा है कि नागरिकों और समाज के संरक्षण के लिए अब केवल राज्य की “मंशा और भावनाओं” तक ही सीमित नहीं रहा जा सकता है. अब जरूरी है कि लोगों, समाज और पर्यावरण के लिए जरूरी विषयों पर औपचारिक रूप से क़ानून बनें. तभी सेवाओं की उपलब्धता और अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है. नीतियां कोई भी हों, राज्य को जवाबदेय और जनकल्याणकारी होना ही होगा.
इन संस्थाओं की पहल से ही भारत में कई महत्वपूर्ण, जनपक्षीय और बदलावकारी क़ानून बने हैं. भारत में आम लोगों को सरकार और उससे जुड़ी हुई व्यवस्था से कभी भी कोई जानकारी लेने या प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं रहा, लेकिन सूचना के अधिकार के जन आन्दोलन (जिसका नेतृत्व मजदूर किसान शक्ति संगठन ने किया) के कारण देश में सूचना के अधिकार का क़ानून बना. बाल मजदूरी का क़ानून भी बंधुआ मुक्ति मोर्चा के संघर्ष के फलस्वरूप अस्तित्व में आया था.
आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद लोगों के सामने रोज़गार का संकट पैदा होने लगा था. आर्थिक विकास की नीतियों के अंतर्गत सरकार का ध्यान आर्थिक विकास के कुछ टापुओं के निर्माण तक सीमित होने लगा और गांवों के सामने रोज़गार का गहरा संकट खड़ा होने लगा. तब सामाजिक नागरिक आन्दोलन की पहल के कारण भारत में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी क़ानून बना.
देश में एक बहुत बड़ी आबादी जनजातीय (आदिवासी) समाज की है. ये समाज प्राकृतिक संसाधनों, मुख्य रूप से जंगलों के बीच या उसके आसपास ही रहता है. लेकिन उपनिवेशकाल से पहले और फिर उपनिवेशकाल के दौरान बनी व्यवस्थाओं ने उन्हें अपने ही घर में अतिक्रमणकारी होने की पहचान दे दी थी. जंगल की जमीन और अन्य संसाधनों पर उनके अधिकार को परिभाषित करने वाला वन अधिकार क़ानून भी जीवन और गरिमा के अभियान के कारण अस्तित्व में आया.
हमारे संविधान में शिक्षा के अधिकार को राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में शामिल किया गया था. यानी नीतियां तो बनती रहीं, लेकिन सबको गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार नहीं मिल पाया. तब सामाजिक नागरिक संस्थाओं और आन्दोलनों की पहल से ही शिक्षा के अधिकार को संविधान के मूलभूत अधिकारों में शामिल किया गया और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार का क़ानून बना.
एक तरफ देश में आर्थिक विकास के उजले पक्ष दिखाए जा रहे थे, वहीं दूसरी तरफ, भुखमरी और कुपोषण का फैलाव भी था. इस विषय पर सामाजिक नागरिक संस्थाओं ने 17 साल तक सर्वोच्च न्यायालय में न्याय की लड़ाई लड़ी. इसी के फलस्वरूप भारत में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून बना.
बच्चों के साथ होने वाली लैंगिक और यौन हिंसा पर कोई स्पष्ट समझ ही नहीं थी, लेकिन हिंसा और शोषण बड़े पैमाने पर विद्यमान रहा है. सामाजिक नागरिक संस्थाओं के संघर्ष के कारण ही लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम बना.
भारतीय दंड संहिता की धारण 377 के तहत समलैंगिकता को अपराध माना जाता था. वर्ष 2001 में नाज़ फाउंडेशन ने दिल्ली उच्च न्यायलय में धारा 377 को गैर-संवैधानिक घोषित करने की मांग की. यह धारा बताती है कि हम ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रति अमानवीयता की हद तक असंवेदनशील हैं. विधि आयोग की 127 वीं रिपोर्ट में भी धारा 377 के अस्तित्व पर पुनर्विचार की जरूरत पेश की थी. लम्बी सामाजिक-न्यायिक लड़ाई के बाद सर्वोच्च न्यायलय ने समलैंगिक सम्बन्ध को अपराध की श्रेणी से बाहर निकाल दिया.
तमाम ऐसे अनुभव और उदाहरण सामने मौजूद हैं, जो यह बताते हैं कि भारत में सामाजिक बदलाव की सबसे ठोस, प्रभावी और परिणाममूलक पहल सामाजिक नागरिक संस्थाओं ने ही की हैं. बच्चों, आदिवासियों, महिलाओं, तीसरे लिंग के समुदाय, जलवायु परिवर्तन, दुखी होकर पलायन करने की स्थितियां, शिक्षा और स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और कुपोषण सरीखे तमाम विषयों पर सामाजिक और नीतिगत पहल की नीव में सामाजिक नागरिक संस्थाएं ही हैं.

सामाजिक नागरिक संस्थाओं के समक्ष चुनौतियां – एक
सचिन कुमार जैन
आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्थाओं ने भारत में नागरिक पहल और सामाजिक नागरिक संस्थाओं के सामने पहचान का संकट खडा कर दिया है. इस संकट को महत्व इसलिए भी मिला क्योंकि संस्थाओं का समूह खुद भी आत्म विश्लेषण के लिए तैयार नहीं होना चाहता है. जब सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्थाओं में बदलाव आता है, तब सामाजिक नागरिक संस्थाओं को भी स्वयं के बारे में, स्वयं के चरित्र और रणनीतियों के बारे में चिंतन-समीक्षा करना चाहिए. यह काम सामाजिक नागरिक संस्थाओं ने नहीं किया. इसका परिणाम यह हुआ कि संस्थाओं की जड़ें कमज़ोर होती गईं. इस तथ्य से कोई असहमत नहीं हो सकता है कि एक सभ्य-सजग और लोकतांत्रिक समाज को स्वस्थ बनाए रखने के लिए नागरिक पहल एक अनिवार्य जरूरत होती है, लेकिन यह भी उतना महत्वपूर्ण सच है कि संस्थाओं को अपने मूल्यों और विचारों को बरकरार रखते हुए अपने आप को नए माहौल के मुताबिक़ तैयार करने की पहल करना चाहिए थी. इसमें चूक तो हुई है.
छवि और स्वीकार्यता के प्रश्न
सामाजिक नागरिक संस्थाओं के बारे में यह धारणा स्थापित की जा रही है कि वे विकास विरोधी, धर्म विरोधी, शहरीकरण विरोधी और सरकार विरोधी होती हैं. उनका उद्देश्य अस्थिरता लाना होता है. लेकिन तथ्य कुछ और ही कहते हैं. तथ्य ये हैं कि मानव अधिकारों के संरक्षण, शिक्षा के अधिकार, जलवायु परिवर्तन, वन अधिकार, सूचना के अधिकार, स्वास्थ्य, पोषण और खाद्य सुरक्षा के अधिकार, विस्थापन के दर्द को नीति और न्याय के पटल पर लाने का काम वास्तव में सामाजिक नागरिक संस्थाओं ने ही किया है.
एक कथानक यह भी बनाया गया है कि उक्त संस्थाओं की प्रशासन व्यवस्था कमज़ोर और अपारदर्शी होती है. जबकि वास्तव में इन संस्थाओं पर 15 क़ानून प्रत्यक्ष रूप से लागू होते हैं और इन्हें सरकार द्वारा विशेष रूचि लेकर लागू करवाया भी जाता है.
यह कहा जाने लगा है कि अब संस्थाएं समाज से कटी हुई हैं. कॉरपोरेट संस्कृति से संचालित होती हैं. इनमें कहीं शीर्ष पर निर्णय लिए जाते हैं और समुदाय पर लागू किये जाते हैं. यह उतना ही सच है, जितना की हमारी राज्य व्यवस्था की कार्यशैली का भी शीर्ष से संचालित होने का सच है.
उक्त संस्थाओं को विवश किया गया है कि वे अपने तात्कालिक लक्ष्यों और कार्यक्रम की उपलब्धियों पर ध्यान केन्द्रित करें. अब तो भारत सरकार और जांच एजेंसियां भी यह जानना चाहती हैं कि संस्थाओं ने कितने बच्चों को स्कूल बैग बांटे, कितने स्वास्थ्य शिविर लगाए, कितने वृद्धों को आश्रय दिया? केवल चैरिटी के काम की ही अनुमति है, समालोचना, समीक्षा और विचार की अनुमति नहीं है! जबकि मूलतः उनका लक्ष्य तो समाज में समानता, न्याय और बंधुता के मूल्यों को स्थापित करना होता है. हर स्तर पर ख़ास तरह की व्यवस्थाएं बना कर संस्थाओं को अपने दीर्घकालिक लक्ष्य से विचलित किया गया है. इन संस्थाओं का स्वभाव होता है कि वे किसी भी विषय को व्यापक नज़रिए के साथ देखें-समझें, समाज की समस्याओं को एक दूसरे के साथ जोड़कर अपने कार्यक्रम संचालित करें. ऐसा नहीं माना गया कि संस्थाओं को एक ही विषय पर काम करना चहिये और बाकी विषय छोड़ देने चाहिये. अब कथानक बदल दिया गया है. किसी भी संस्था से यह अपेक्षा की जाती है कि वह किसी भी एक विषय की विशेषज्ञ बन जाए और अन्य विषयों में दखल न दे या पहल न करे. ऐसी सोच से सामाजिक नागरिक संस्थाओं का वैचारिक आधार कमज़ोर हुआ है और वे अपनी भूमिका को निभाने में कमज़ोर साबित होने लगी हैं.
अब उक्त संस्थाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे तमाम आधुनिक जटिल तकनीकों को अपनाएं. उन पर दबाव है कि वे जटिल अध्ययन भी करें, जटिल प्रशिक्षण भी करें, उनकी सारी प्रस्तुति अंग्रेजी भाषा में हो. उन्हें लगातार नवाचार करते रहना चाहिए ताकि उनकी स्वीकार्यता बनी रहे. छोटी-मझोली-क्षेत्रीय सामाजिक नागरिक संस्थाओं से बहुत अधिक तकनीकी कौशल के साथ काम करने की अपेक्षा की जाने लगी है. जबकि दूसरी तरफ भारत में सामाजिक नागरिक संस्थाओं को (खासकर उन्हें जो छोटे और मझोले आकार की हैं और अंचलों में स्थानीय भाषा में सबसे वंचित समूहों के साथ सामाजिक आर्थिक बदलाव लाने का प्रयास कर रही हैं), अपनी क्षमताएं विकसित करने और अपेक्षाओं के अनुसार व्यवस्थाएं बनाने में कोई मदद नहीं की जाती है. परिणाम यह कि सकारात्मक नज़रिए से समाज में काम करने वाली संस्थाएं “व्यवस्थागत अपेक्षाओं” के चलते नकारात्मक छवि की शिकार हो जाती हैं.
सामाजिक नागरिक संस्थाएं और विविधता
यहाँ वस्तुतः हम विविधता का सन्दर्भ संस्था के बोर्ड, सञ्चालन समूह और वहां काम करने वाले लोगों के समूह में सामाजिक-सांस्कृतिक-वैचारिक-लैंगिक विविधता से ले रहे हैं. चूंकि ये संस्थाएं समतामूलक समाज के निर्माण के सपने को शिरोधार्य करती हैं, इसलिए यह जांचना बहुत जरूरी हो जाता है कि इन संस्थाओं में सबसे पहले विविधता का समावेश हो. मौजूद अनुभव यह बताते हैं कि यह कतई आवश्यक नहीं है कि समाज का जो समुदाय वंचितपन से त्रस्त है, वही अपना संघर्ष खड़ा करे या संस्थागत पहल करे. वहीँ दूसरी तरफ, ऐसे संस्थागत और आन्दोलनों के प्रमाण भी सामने हैं, जहाँ आदिवासी-दलित और लैंगिक असमानता के विषयों पर उन्हीं समुदायों ने पहल की, जो असमानता का दंश भुगत रहे हैं.
इन संस्थाओं में विविधता से जुड़े पहलू को हम पांच बिन्दुओं के साथ बेहतर ढंग से समझ सकते हैं.

1. भूमिकाओं के स्तर – भारत में उक्त संस्थाओं का एक वृहद् समुदाय है और इस समुदाय में शामिल संस्थाएं अलग-अलग रणनीतियों और सोच के साथ सामाजिक-आर्थिक बदलाव की पहल करती हैं. संस्थाओं के एक बड़े तबके में यह नज़र आता है कि वहां नेतृत्व और निर्णायक भूमिकाओं में वंचित और उपेक्षित तबकों से जुड़े व्यक्तियों को महत्वपूर्ण भूमिकाएं नहीं दी जाती हैं. वहां माना जाता है कि इस तरह की भूमिकाएं निभाने के लिए विशेष किस्म के भाषाई और तकनीकी कौशल की आवश्यकता होती है, जो आदिवासी, दलित या महिला कार्यकर्ताओं में सहजता से उपलब्ध नहीं होते हैं. इस तरह की धारणा वास्तव में आदिवासी-दलित-महिलाओं में वह भूमिकाएं लेने का अनुभव और क्षमताएं ही विकसित नहीं होने देती है. विश्वास की कमी अवसर की कमी बन जाती है और अवसर की कमी नेतृत्व को पनपने नहीं देती है.

ऐसी स्थिति में हम यह पाते हैं कि आदिवासी-दलित-महिलाओं को नेतृत्व के स्तर पर अवसर नहीं मिलते, लेकिन उन्हें माध्यम या समुदाय के स्तर पर काम करने के लिए जरूर शामिल किया जाता है. वहां यह मान्यता काम करती है कि कार्यक्रम को समुदाय या मैदानी स्तर पर सफल बनाने के लिए यह जरूरी होता है कि उन्हीं समुदायों के व्यक्तियों को सामुदायिक कार्यकर्ता या सामुदायिक समन्वयक के रूप में नियुक्त किया जाए. संस्थाओं के स्तर पर यह वास्तव में एक सुरक्षित रणनीतिक पहल होती है.

इन संस्थाओं में नियुक्ति का मुख्य आधार तो कौशल, अनुभव, विशेषज्ञता और तकनीकी समझ ही होता है. अगर किसी आदिवासी, दलित, महिला या अल्पसंख्यक में ये गुण मिल जाते हैं, तो उसे नियुक्त कर लिया जाता है. ऐसा कम ही होता है कि व्यक्ति में ये गुण भले ही कुछ कमतर हों और उसमें इन गुणों के विकास की पूरी संभानाएं हों, तो उसे विविधता के नज़रिए से संस्था में शामिल कर लिया जाए.

2. विशेषज्ञ तकनीकी सामाजिक नागरिक संस्थाओं में नगण्यता –संस्थाओं में कई संस्थाएं शोध और प्रशिक्षण का काम करती हैं. इन कामों के बारे में यह माना जाता है कि इनके लिए विशेष किस्म की दक्षता, कौशल और व्यक्तित्व की जरूरत होती है. अगर शोध और अध्ययन का तकनीकी कौशल नहीं होगा, तो व्यक्ति को अवसर नहीं मिलते हैं. ऐसी स्थिति में आदिवासी-दलित-महिलायें-अल्पसंख्यक समुदायों के व्यक्तिओं को अहम् भूमिकाएं प्रदान नहीं की जाती हैं.

3. वित्तीय संसाधनों के सन्दर्भ में दुविधा और दोहरा चरित्र –संस्थाएं जिन वित्तीय संसाधनों पर निर्भर करती हैं, वहां उन्हें समाज के वंचित समूहों के व्यक्तियों को अपने काम से जोड़ने के लिए माकूल सहयोग और समर्थन नहीं मिलता है. एक तरफ तो वित्तीय संसाधन प्रदान करने वाली संस्थाएं यह कहती हैं कि उनकी साझेदार संस्थाएं वंचित समुदायों के व्यक्तियों को अहम् भोमिकाएं प्रदान करें, लेकिन दूसरी तरफ वे अपने काम की गति, गुणवत्ता और प्रभाव से सम्बंधित अपेक्षाओं को कम नहीं करती हैं. वे यह मानने को तैयार नहीं होती हैं कि अगर हम संस्थाओं में विविधता लाने के लिए निवेश करेंगे, तो इससे अपने आप में बदलाव का एक बड़ा आधार तैयार हो जाएगा.

4. प्रक्रिया का अभाव –संस्थाएं एक समुदाय के बीच में लम्बे अरसे तक काम करती हैं. अगर उनके पास एक प्रतिबद्ध योजना रहे तो वे अपने कार्यक्षेत्र से ही ऐसे व्यक्तियों को तैयार कर सकती हैं, जो संस्था में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाने के लिए सक्षम हों. समुदाय में ही काम करते हुए, वहां के युवाओं को, महिलाओं को प्रशिक्षण कार्यक्रमों में स्रोत व्यक्ति के रूप में शामिल किया जा सकता है. उन्हें स्थानीय स्तर पर शोध के लिए भी तैयार किया जा सकता है. लेकिन साथ ही यह भी जरूरी हो जाता है कि उनकी शिक्षा और तकनीकी कौशल को मज़बूत करने के लिए संस्थागत निवेश किया जा सके. वास्तव में सामजिक नागरिक संस्थाओं में सामाजिक-संस्कृतिक विविधता लाने की कोई जवाबदेय नीति नहीं होती है, यह एक वैकल्पिक शर्त होती है.

5. भीतरी ताना बाना –संस्थाओं की स्थापना और उनके स्वरुप का निर्धारण जिनके द्वारा किया जाता है, उनके अपने स्वभाव और सोच का विविधता से गहरा जुड़ाव होता है. अगर संस्था का गठन महिला, आदिवासी, दलित या अल्पसंख्यक व्यक्तियों द्वारा किया जाता है, तो वहां विविधता का रूप दूसरा हो जाता है. अगर तार्किक ढंग से सोचा जाए, तो दोनों ही अतिरेक की स्थितियां स्थाई बदलाव नहीं लायेंगी. वास्तव में उक्त संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे किस तरह की विविधता की वकालत करते हैं, उसी तरह की विविधता संस्थाओं के भीतर स्थापित हो.

सामाजिक नागरिक संस्थाओं के समक्ष चुनौतियां – दो
सचिन कुमार जैन
यह वक्त की जरूरत है कि सामाजिक नागरिक संस्थाएं आत्मावलोकन के लिए अपने आप को तैयार करें. यह समझना अजरूरी है कि ऐसे कौन से पक्ष हैं, जिन्होंने संस्थाओं की पहचान को चुनौती दी है. यह स्वीकार करने में कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि जनता के हकों के लिए सड़कों से लेकर व्यवस्था के गलियारों तक बेहद आत्मविश्वास और तैयारी के साथ संघर्ष करने वाली सामाजिक नागरिक संस्थाएं उस वक्त संगठित होकर खड़ी नहीं हो पाईं, जब उन्हें अपने पक्ष को तथ्यों और तर्कों के साथ समाज के सामने रखना था.

विदेशी अनुदान का अनछुआ पक्ष
सामाजिक नागरिक संस्थाओं को विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम के तहत विदेशों से मिलने वाली आर्थिक सहायता पर बहुत बहस होती रही है. संस्थाओं की पहचान, उनकी मंशा और चरित्र पर सवाल खड़े करने के लिए इसका ज्यादा उपयोग हुआ है. बीच बहस बस इतना सवाल पूछते रहना होगा कि आखिर कारण क्या हैं? भारत में कुल 50111 संस्थाओं को इस अधनियम के तहत पंजीकृत किया गया है. इस अधिनियम के दो प्रावधानों का सन्दर्भ लेना बहुत जरूरी है. एक प्रावधान यह कहता है कि जो संस्थाएं नियमित रूप से वार्षिक विवरणी (रिटर्न) जमा नहीं करेंगी, उनका पंजीयन रद्द किया जा सकता है. जिन 20679 संस्थाओं का पंजीयन रद्द किया गया है, उनमें से 95 प्रतिशत से ज्यादा का पंजीयन वार्षिक विवरणी जमा नहीं करने के कारण ही रद्द हुआ है. वास्तविकता यह है कि हज़ारों संस्थाओं ने विदेशी अंशदान अधिनियम में पंजीयन तो करवा लिया, लेकिन उनमें इतनी क्षमताएं और कौशल नहीं था कि वे अंशदान प्राप्त कर पातीं. जब कोई अनुदान या अंशदान मिला ही नहीं, तो उन्होंने वार्षिक विवरणी जमा नहीं की. यह क़ानून के प्रावधान का उल्लंघन हो सकता है, किन्तु राष्ट्रद्रोह या व्यवस्था के खिलाफ कोई षड्यंत्र तो नहीं ही माना जा सकता है.
अधिनियम का दूसरा प्रावधान यह है कि हर 5 वर्ष में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में दर्ज संस्थाओं को पंजीयन का नवीनीकरण करवाना होगा. यहाँ भी ऐसा ही हुआ. हज़ारों संस्थाओं को न तो कोई अनुदान मिला, न ही किसी ने उनकी सहायता की कि वे अपने आप को सक्षम बना पातीं. इसके बाद उन्होंने यह पाया कि इस इस क़ानून का अनुपालन बहुत जटिल और चुनौतीपूर्ण काम है. छोटी-मझौली संस्थाएं इतना दबाव झेल पाने की स्थति में नहीं रहीं, और उन्होंने निश्चित समयावधि गुज़र जाने के बाद पंजीयन के नवीनीकरण के लिए आवेदन ही नहीं किया. इसके कारण से 12543 संस्थाओं का पंजीयन रद्द हो गया. ऐसा होना भी किसी षड्यंत्र या अपराध की श्रेणी में नहीं आता है. इन दो कारणों से रद्द होने वाले पंजीयन और वास्तव में भ्रष्टाचार या आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होने के कारण रद्द किये गए पंजीयनों की जानकारी को स्पष्ट नहीं किया गया और सार्वजनिक पटल से लेकर संसद और सर्वोच्च न्यायालय के पटल पर यही कहा गया कि क़ानून के उल्लंघन के कारण 33222 यानी 66 प्रतिशत संस्थाओं के पंजीयन रद्द किये गए. यह नहीं बताया कि ये उल्लंघन किस किस तरह के प्रावधानों के अंतर्गत थे? सामाजिक नागरिक संस्थाओं की यही सबसे बड़ी कमजोरी और अकर्मण्यता है कि वे अपने क्षेत्र, समाज और उससे सम्बंधित नीतिगत-राजनैतिक स्थितियों का विश्लेषण नहीं करते हैं और अपना पक्ष रख पाने में कमज़ोर हैं. उक्त संस्थाएं यह तर्क रखने में नाकाम रहीं कि किसी भी आचरण के लिए सामाजिक नागरिक संस्थाओं को भी उतना ही दोषी माना जा सकता है, जितना की क़ानून परिभाषित करता है. संस्थाओं के वजूद को ख़तम कर देने की मंशा न तो नैतिक है और न ही संवैधानिक.
व्यापक आर्थिक-राजनीतिक नज़रिए से बढ़ती दूरी
नये सन्दर्भों में एक तरफ तो स्वतंत्र आर्थिक संसाधन सीमित हुए हैं, लेकिन दूसरी तरफ कॉरपोरेट नियंत्रित संसाधनों का दायरा और फैलाव बहुत बढ़ा है. इसका प्रभाव यह हुआ है कि संस्थाओं से “व्यवस्थागत अपेक्षाएं और तात्कालिक उपलब्धियों” को केंद्र में रखने का दबाव बढ़ता गया है. अब तो सामाजिक क्षेत्र में “लाभकारी संस्थाएं” भी सक्रिय भूमिका में आ रही हैं. यह नया पारिस्थितिकी तंत्र है.
किसी भी सामाजिक-आर्थिक बदलाव का लक्ष्य राजनैतिक नज़रिया और रणनीतियां अपनाए बिना हासिल नहीं किया जा सकता है. यही कारण है कि सामाजिक नागरिक संस्थाएं दलीय राजनीति का हिस्सा बने बगैर जनतांत्रिक माध्यमों का इस्तेमाल करके वंचित तबकों की आवाज़ को बुलंद करती रही हैं. लेकिन नया कानूनी तंत्र सामाजिक नागरिक संस्थाओं की इस रणनीति को ‘आपराधिक”’ करार देता है. नया राज्य तंत्र यह चाहता है कि सामाजिक नागरिक संस्थाएं राज्य व्यवस्था/सरकार की एक अतिरिक्त भुजा बन कर काम करें. इन संस्थाओं को केवल “सेवा और करुणा” से सम्बंधित काम करना चाहिए. संस्थाओं को कभी भी एक तबके की आवाज़ को समाज की आवाज़ बनाने की कोशिश नहीं करना चाहिए. कुल मिलाकर सामाजिक नागरिक संस्थाओं को समाज की समस्याओं के मूल कारणों पर बहस और पहल नहीं करना चाहिए. उनसे केवल इतनी ही अपेक्षा है कि वे (संस्थाएं) घावों की मरहम पट्टी करती रहें, लेकिन घाव क्यों हुआ, उस घटना और परिस्थिति को सतह पर न लायें.
वर्तमान स्थिति के आंकलन से पता चलता है कि अब छोटी-मझोली और आंचलिक संस्थाओं के सामने अपने अस्तित्व को बचाने चुनौती है क्योंकि जिस तरह की कानूनी व्यवस्थाएं बनायी जा रही हैं और तकनीकी कौशल की अपेक्षा की जा रही है, उन्हें देखते हुए यह तय है कि अब आर्थिक संसाधनों और साझेदारी के लिए बड़े आकार की संगठित और प्रबंधन में सक्षम संस्थाओं को ज्यादा तवज्जो दी जाने लगी है. इसके कारण छोटी और मझौली संस्थाओं का काम करना बहुत कठिन होता जाएगा.
आत्म-विश्लेषण से संकोच
इसमें दो राय नहीं कि भारत में संस्थाओं को अब अपने संगठन, अपनी व्यवस्था और अपनी आवाज़ को मज़बूत बनाने की पहल करने की जरूरत है. जब तक संस्थाओं का समुदाय अपने लिए नैतिक व्यवस्थागत मानक तैयार नहीं करेगा, तब तक राज्य व्यवस्था का दबाव बढ़ना स्वाभाविक ही है. वास्तव में अब प्रबंधन की व्यवस्थाओं को ढांचागत रूप देने, संस्थाओं की टीमों की क्षमता वृद्धि करने और समाज से ज्यादा से ज्यादा जुड़ाव बनाने की पहल करने जरूरत है.
इन संस्थाओं को अपने काम के नज़रिए को विस्तार देने, अपने विषय और उसके आयामों को गहराई से समझने के लिए व्यवस्थित पहल करने और उस बदलाव के बारे में खुलकर बात करने की जरूरत है, जो वे लाना चाहते हैं. बदलाव ऐसा होना चाहिए, जिसे मापा भी जा सके और महसूस भी किया जा सके. इस सन्दर्भ में सामाजिक नागरिक संस्थाओं को अपने दावों की समीक्षा के लिए भी तैयार रहना होगा.
उक्त संस्थाओं की स्वीकार्यता तभी स्थापित होगी, जब संस्था के हर सदस्य की समझ विकसित होगी. हमें यह तो मानना ही होगा कि अभी संस्था की पहचान और वजूद एक-दो व्यक्तियों की समझ और प्रस्तुति पर टिके होते हैं.
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अब तथ्यों, आंकड़ों और प्रमाणों को बहुत जरूरी माना जाने लगा है. उक्त संस्थाओं को अब अपने विषय, अपने कार्यक्रम और अपने विचार से सम्बंधित जानकारियों, नीतियों के विशेल्शन और आंकड़ों के रखरखाव और मानक वित्तीय प्रबंधन की व्यवस्था अनिवार्य रूप से बना लेनी चाहिए.
समुदाय और समाज का मतलब क्या है; यह भी खंगाला जाना चाहिए. जब यह कहा जाता है कि सामाजिक नागरिक संस्थाएं “समुदाय” में या समुदाय के साथ काम करती हैं, तब वास्तव में वहां व्यापक समुदाय की बात नहीं होती, बल्कि समुदाय के कुछ ख़ास वर्गों और परिवारों की बात होती है. अगर संस्थाएं 50-100 गांवों में या 10-15 बस्तियों में काम करती हैं, तब वास्तव में उनके कार्यक्रम का दायरा उन गांवों या बस्तियों का एक ख़ास समूह या कुछ तयशुदा परिवार होते हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन पर “तुरत-फुरत” बदलाव लाने का दबाव होता है. उन्हें बदलाव के आंकड़े देने होते हैं, बदलाव की कहानियां सुनानी होती हैं.
सामाजिक संस्थाएं विभिन्न क्षेत्रों में रचनात्मक भूमिकाएं निभा रही हैं. लेकिन इसके बाद भी समाज और व्यवस्था में उनके बारे में बना हुआ कथानक नकारात्मक ही है. इसके पीछे का कारण है, उनके द्वारा समाज और व्यवस्था के विभिन्न समूहों से निरंतर संवाद नहीं किया जाना. जब संवाद नहीं होता है तो परिचय नहीं हो पाता है. और जब परिचय नहीं हो पाता है तो रिश्ते नहीं बन पाते हैं.

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