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असर विशेष: ज्ञान गंगा”पितामह का सुशासन”

रिटायर्ड मेजर जनरल एके शौरी की कलम से...

रिटायर्ड मेजर जनरल एके शौरी 

महाभारत एक ऐसा महाग्रंथ है, जिसके बारे में यह भ्रान्तियाँ हमारे समाज में फैलाई गयी है कि इसे घर में नहीं रखना चाहिए वरना भाई- भाई आपस में लड़ पड़ेंगे। ऐसी ही भ्रान्ति के कारण लोगों ने इस महाग्रंथ को घर में नहीं रखा और जब घर में ही नहीं था, तो उसे पढ़ते कैसे?

 महाभारत में एक लाख से भी अधिक श्लोक हैं और हरेक श्लोक दो पंक्तियों में है। यह स्वंय में इतना विस्तृत है कि वाल्मीकि रामायण से चार गुणा अधिक है।

 महाभारत को पाचवां वेद भी कहा जाता है. इसमें १८ पर्व याने पुस्तकें हैं|

अब, वाल्मीकि रामयाण को पड़ने वाले ही कुछ लोग हैं, तो महाभारत को कहां से पढ़ेंगे? परिणाम यह हुआ कि जो कुछ एक ग्लैमर युक्त तरीके से सिनेमा व टीवी पर दिखाया गया, उससे अधिक लोगों को जानकारी नहीं हो सकी|

 

 उससे भी बड़ी बात यह हुई कि हमारे देश के अधिकतर कथावाचक इन ग्रन्थों में छुपी हुई फिलोसफी, सामाजिक शास्त्र, शासन-प्रणाली, दंड–व्यवस्था, वित्तीय प्रबन्धन के सिधान्न्त, नैतिक मूल्य आदि अनेकों मूल्यों व प्रणालीयों के बारे में खुल कर बताने व लोगों को समझाने के बजाए, उनको औलौकिक व चमत्कारी दुनिया के सपने ही दिखलाते रहे।

 

 इसी कारण हमारे महान ग्रन्थ जो कि ज्ञान की एक अथाह खान है, स्वंय को भली भांति लोगों तक नहीं पहुंचा पाए. ज्ञान गंगा स्तम्भ के माध्यम से मेरा यह प्रयास है कि मैं इस क्षेत्र में एक ऐसा प्रयास करूं ताकि ज्ञान की गंगा में लोगों को नहला सकूं|

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इसी कड़ी में आगे चलते हुए महाभारत से सर्वप्रथम भीष्म पितामह के सुशासन के सिधान्तों को विस्तार से बताया जाएग।. 

महाभारत के अनेकों महानायकों में से एक भीष्म पितामह से कौन परिचित नहीं होगा।उनका नाम कानों में पड़ते ही हमारी आँखों के सामने एक वीर व अजेय योधा की छवि सामने आ जाती है जिसकी प्रतिज्ञा को एक उदाहरण की तरह माना जाता है|

अपने राजा के प्रति ऐसी सम्पूर्ण बधता जिसके लिय अपने प्राणों की आहुति देना एक मामूली सा कार्य हो, ऐसी सोच भीष्म पितामह की ही हो सकती है। हालांकि महाभारत में कुछ ऐसी घटनाएं हुई जिस समय मन में एक प्रश्न आता है कि भीष्म पितामह खामोश क्यों रहे, याद करें द्रौपदी का चीर-हरण|

 लेकिन, क्योंकि पितामह की प्रतिज्ञा अपने राजा के प्रति पूर्ण निष्ठा की थी, तो वे ऐसे समय में अपने राजा के खिलाफ नहीं गये। जैसा कि अक्सर देखा गया है कि हमारे समाज के लोगों की ऐसे शूरवीरों व महान लोगों के बारे में जानकारी अत्यंत कम है। आम लोग उनको फिल्मों व टीवी पर तीर चलाते देख कर ही खुश हो जाते है।

 लोगों को इस बात का ज्ञान इतना नही कि ऐसे महानायक स्वंय में कैसी कैसी विशेषताओं को समए हुय थे।

 महाभारत की कहानी तो काफी हद तक लोगों को मालूम है लेकिन शायद कम लोगों को ही इस बात का ज्ञान होगा कि भीष्म पितामह ज्ञान की एक ऐसी खान थे कि जब वे बाणों की शैय्या पर लेटे अपनी म्रत्यु का इंतज़ार कर रहे थे, तो उस समय युधिष्ठर व दुर्योधन उनके पास शिक्षा प्राप्त करने के लिय ही गये थे।

दरअसल, युधिष्टर और दुर्योधन, दोनों ही अपनी अपनी विजय के प्रति आश्वस्त थे. दोनों को ही इस बात का पूर्ण विश्वास था कि विजयप्राप्ति उपरान्त वे ही राज-पाट सम्भालेंगे, इसलिय वे भीष्म पितामह के पास इस लिय गये थे कि पितामह उनको एक कुशल शासन व्यवस्था चलाने के महत्वपूर्ण सूत्रों व नियमों के बारे में जानकारी दें, क्योंकि इस मामले में भीष्म पितामह का ज्ञान बहुत अधिक था। 

भीष्म पितामह ने बाणों की शैय्या पर लेटे हुय ही उन दोनों को एक राजा को किस प्रकार से कुशल शासन प्रबन्धन करना चाहिए , इस के बारे में अत्यंत विस्तृत से बताया|

 

 इस को महाभारत के अनुशासन पर्व में बताया गया है।उस समय श्री कृष्ण भी उपस्थित थे और वे भी इस विषय पर भीष्म पितामह की बातों को ध्यान से सुन रहे थे।अधिकतर प्रश्न युधिष्टर ने किय थे।

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