सम्पादकीय

असर संपादकीय : नए सुधारों ने दिए देश में कृषि को नए आयाम *अजय भारद्वाज

 

किसानों के भारी कर्ज के नीचे दबे होने के कारण खेती तेजी से एक चुनौतीपूर्ण व्यवसाय बनता जा रहा है, जिसके कारण किसानों को अब अपनी फसलों से भरपूर लाभ नहीं मिल पा रहा है ।

इसका उपयुक्त हल निकालने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में विचारों और तर्कों का मंथन होता रहा है, लेकिन कृषि सुधारों में एक नया अध्याय मोदी सरकार ने जोड़ा जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसानों को उनकी उत्पादन लागत से अधिक प्रतिफल मिले ताकि 2022 तक उनकी आय दोगुनी हो जाए।

तीन कृषि विधेयकों का उद्देश्य किसानों के विपणन कौशल को बढ़ाना हैं, ताकि वे अपनी उपज के लिए बेहतर बाजार तलाश सकें। इन्हें लागू करने के अलावा मोदी सरकार किसानों को आश्वस्त करने के लिए एमएसपी में लगातार वृद्धि करती रही है। इसका उद्देश्य उस दुर्भावनापूर्ण और भ्रामक प्रचार को भी दूर करना है कि एमएसपी प्रणाली समाप्त करना चाहता है। मौजूदा एमएसपी और मंडी प्रणाली को जारी रखने के लिए केंद्र के अथक समर्थन के साथ-साथ किसानों को गेहूं-धान के दुष्चक्र से दूर करने और खेती योग्य भूमि से लाभ बढ़ाने के लिए नवीन तरीकों को अपनाने के प्रयास किए गए हैं।

मोदी सरकार द्वारा की गई ऐतिहासिक पहलों में से एक फसलों का प्रतिफल सीधे किसानों के बैंक खातों में जमा करना था। इसने न केवल यह सुनिश्चित किया कि किसानों को उनका पारिश्रमिक समय पर मिले, बल्कि बिचौलियों द्वारा किए जा रहे शोषण को भी समाप्त कर दिया।

इसके उपरांत शीघ्र ही तीनों कृषि विधेयकों के विषय, प्रकरण और मंशा पर देश भर में व्यापक बहस और चर्चा हुई, जिसमें केंद्र द्वारा स्पष्ट रूप से कहा गया कि बिलों का एकमात्र उद्देश्य किसानों की विपणन शक्ति को मजबूत करना था।

भले ही विधेयकों के आख्यान को विकृत करने और दूषित करने के भरपूर प्रयास किए गए हो, लेकिन अब सभी को एहसास हो रहा है कि इसका लाभ किसानों को अवश्यंभावी मिल रहा है।

भारत ने इस साल की शुरुआत में एमएसपी पर किसानों से अब तक की सबसे बड़ी खरीद दर्ज की, जिसके परिणामस्वरूप 1,70,000 करोड़ रुपये सीधे धान किसानों के खाते में और लगभग 85,000 करोड़ रुपये गेहूं किसानों के खाते में आए ।

इतना ही नहीं, भारत पहली बार कृषि निर्यात में दुनिया के दस शीर्ष देशों में शामिल हो गया।

प्रधानमंत्री ने व्यापक रूप से स्पष्ट किया है कि देश की कृषि नीतियों में अब छोटे किसानों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है।

पिछले अगस्त में प्रधान मंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) के तहत 19,500 करोड़ रुपये से अधिक की राशि 9.75 करोड़ से अधिक लाभार्थी किसान परिवारों को प्रधान मंत्री द्वारा जारी की गई थी, और यह प्रधान मंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) के तहत नौवीं बार किया गया था ।

इस सप्ताह प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने सभी अनिवार्य रबी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि को मंजूरी दे दी है । पिछले वर्ष की तुलना में एमएसपी में सर्वाधिक पूर्ण वृद्धि की सिफारिश मसूर के लिए की गई। मसूर, रेपसीड और सरसों में 400 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि और उसके बाद चना में 130 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई । कुसुम की खरीद में पिछले वर्ष की तुलना में 114 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है।

वह इससे साफ पता चलता है कि उस अंतर पारिश्रमिक का उद्देश्य फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना है।

इसलिए, एमएसपी में यह वृद्धि केंद्रीय बजट 2018-19 के अनुरूप है, जिसमें एमएसपी को उत्पादन की अखिल भारतीय भारित औसत लागत के कम से कम 1.5 गुना के स्तर पर तय करने की घोषणा की गई थी, जिसका लक्ष्य किसानों को उचित व लाभदायक पारिश्रमिक मिलना है। गेहूं, रेपसीड और सरसों के मामले में किसानों को उनकी उत्पादन लागत पर अपेक्षित आय सबसे अधिक (शत प्रतिशत) होने का अनुमान है, इसके बाद मसूर (79%); चना (74%); जौ (60%) और कुसुम (50%) आती है।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान तिलहन, दलहन और मोटे अनाज के पक्ष में एमएसपी को पुनः संरेखित करने के लिए कुछ ठोस प्रयास किए गए हैं ताकि इन फसलों का क्षेत्र बढ़ाया जा सके। साथ ही किसानों को सर्वोत्तम तकनीकों और कृषि पद्धतियों को अपनाकर मांग और आपूर्ति असंतुलन को सही करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके ।

सरकार द्वारा 2018 में घोषित अम्ब्रेला योजना “प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान” (पीएम-आशा) किसानों को उनकी उपज के लिए लाभकारी प्रतिफल प्रदान कर रही है। अम्ब्रेला योजना में तीन उप-योजनाएं यानी मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस), मूल्य कमी भुगतान योजना (पीडीपीएस) और निजी खरीद और स्टॉकिस्ट योजना (पीपीएसएस) पायलट आधार पर शामिल की गई हैं।

सरकार ने देश भर के प्रत्येक ग्रामीण जिले में कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) खोलने का प्रावधान किया है। अब तक देश भर में कुल 725 केवीके स्थापित किए जा चुके हैं।

इसके अलावा, केंद्र ने कई अभिनव कदम भी उठाए हैं जैसे किसानों को संस्थागत ऋण बढ़ाना; कृषि उत्पादों के शेल्फ जीवन को बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक भंडारण के बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देना; कृषि को प्रतिस्पर्धी और लाभदायक बनाने के लिए कृषि तकनीक अवसंरचना कोष की स्थापना; वाणिज्यिक जैविक खेती आदि का विकास करना इत्यादि ।

पीएम-किसान योजना के तहत, सरकार 3 समान किश्तों में प्रति वर्ष ₹6,000 प्रदान करती है और अब तक 10.74 करोड़ किसान परिवारों को कुल ₹1,15,276.77 करोड़ जारी किए गए हैं।

लगभग 23 करोड़ किसानों ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) के तहत पंजीकृत किया है और 7.6 करोड़ से अधिक किसान आवेदकों को 90,927 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा मिला है।

इस अवधि के दौरान, किसानों द्वारा बीमा-शुल्क के अपने हिस्से के रूप में लगभग 17,510 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया, जिसके बदले उन्हें लगभग 90,000 करोड़ रुपये के मुआवज़े का भुगतान किया गया है। इस प्रकार, किसानों द्वारा भुगतान किए गए प्रत्येक 100 रुपये के बीमा-शुल्क के लिए, उन्हें मुआवज़े के रूप में 520 रुपये प्राप्त हुए हैं।

केंद्र देश में किसानों को रियायती दरों पर बीज, उर्वरक, कृषि मशीनरी और उपकरण, सिंचाई सुविधाएं, संस्थागत ऋण आदि जैसे कृषि आदानों की आपूर्ति के लिए विभिन्न योजनाओं को क्रियान्वित कर रहा है। इन सभी प्रयत्नों का उद्देश्य किसानों की अवस्था में सुधार लाना और खेती को लाभकारी और सम्मानजनक व्यवसाय बनाना है।

 

 

 

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